शुभ संध्या मित्रों,
मन बड़ा ही व्यथित है आज…… अजीब लगता है जब किसी ऊँचे पद पर आसीन व्यक्ति को अपने से नीचे ओहदे के व्यक्ति से ओछे ढंग से बात करते देखती-सुनती हूँ। क्या उस पढ़े-लिखे इंसान को इतनी समझ नहीं कि जिस इंसान को वो तनख्वाह देता है, वो उस तनख्वाह के बदले में अपनी सेवायें देता है, अपना समय देता है। ये ठीक है कि यदि वो अपना काम ईमानदारी से नहीं कर रहा है तो उसे समझाया जाए, लेकिन उसकी बेइज़्ज़ती करने का किसी को कोई अधिकार नहीं।
जानती हूँ कि ये हर कहीं होता है, लेकिन शिक्षा के मंदिर में ये अशोभनीय है। कुछ नहीं कर सकते, लेकिन लिख कर अपना विरोध तो जता ही सकते हैं। आखिर अपराध सहना, अपराध करने से ज़्यादा बड़ा गुनाह है।
क्षमा करें लेकिन सहन नहीं हुआ तो कहना पड़ा।
शुभ रात्रि
मन बड़ा ही व्यथित है आज…… अजीब लगता है जब किसी ऊँचे पद पर आसीन व्यक्ति को अपने से नीचे ओहदे के व्यक्ति से ओछे ढंग से बात करते देखती-सुनती हूँ। क्या उस पढ़े-लिखे इंसान को इतनी समझ नहीं कि जिस इंसान को वो तनख्वाह देता है, वो उस तनख्वाह के बदले में अपनी सेवायें देता है, अपना समय देता है। ये ठीक है कि यदि वो अपना काम ईमानदारी से नहीं कर रहा है तो उसे समझाया जाए, लेकिन उसकी बेइज़्ज़ती करने का किसी को कोई अधिकार नहीं।
जानती हूँ कि ये हर कहीं होता है, लेकिन शिक्षा के मंदिर में ये अशोभनीय है। कुछ नहीं कर सकते, लेकिन लिख कर अपना विरोध तो जता ही सकते हैं। आखिर अपराध सहना, अपराध करने से ज़्यादा बड़ा गुनाह है।
क्षमा करें लेकिन सहन नहीं हुआ तो कहना पड़ा।
शुभ रात्रि