मित्रों,
बेहद अफ़सोस है कि हम 'निर्भया' के गुनाहगारों को अब तक उचित दंड नहीं दिलवा पाए। आज अपने देश के क़ानून की तरफ से बेहद शर्मिंदा महसूस कर रही हूँ। सिर्फ इसलिए कि मुजरिम बालिग़ होने की उम्र (संवैधानिक रूप से) से कुछ महीने छोटा है, उसे कितना भी जघन्य अपराध पर मामूली सी सज़ा दे कर छोड़ दिया जाएगा जिससे आगे चलकर वो और भी निर्मम कृत्य करे। क्या आदर्श प्रस्तुत कर रही है हमारे देश की अदालत उन समस्त नाबालिग़ (तथाकथित) अपराधियों के समक्ष कि बच्चे! तुम अभी छोटे हो, जितने चाहो अपराध करो, तुम्हें माफ़ है। या क्या आदर्श प्रस्तुत किया जा रहा है उन बेटियों के समक्ष कि तुम्हारे साथ कुछ भी हो जाए, तुम्हारी जान ही क्यों न चली जाए, लेकिन हम तुम्हारे अपराधी को बच्चा समझ के छोड़ देंगे।
मैं भी समझती हूँ कि अपराधी की उम्र मायने रखती है, लेकिन क्या उसका अपराध मायने नहीं रखता? छोटी-मोटी चोरी नहीं की है उसने। पूरे होशो-हवास में अपराध किया है उसने और बाकी के चारों को भी प्रेरित किया है। ये छोटी बात नहीं है माननीय न्यायाधीश जी। वो ही घिस-पिटा सवाल एक बार और कि अगर ऐसा आपकी या देश के किसी बड़े रसूखदार की बेटी के साथ हुआ होता तो भी क्या उसे यूँ ही सुधार गृह भेज दिया जाता?
बड़ी उम्मीद थी, लेकिन हुआ कुछ भी नहीं। 'निर्भया', नम आँखों से क्षमा मांगते हैं तुमसे और गुज़ारिश करते हैं "न आना इस देश मेरी लाडो"।