शनिवार, 31 अगस्त 2013

"न आना इस देश मेरी लाडो"

मित्रों,
बेहद अफ़सोस है  कि हम 'निर्भया' के गुनाहगारों को अब तक उचित दंड नहीं दिलवा पाए। आज अपने देश के क़ानून की तरफ से बेहद शर्मिंदा महसूस कर रही हूँ। सिर्फ इसलिए कि मुजरिम बालिग़ होने की उम्र (संवैधानिक रूप से) से कुछ महीने छोटा है, उसे कितना भी जघन्य अपराध पर मामूली सी सज़ा दे कर छोड़ दिया जाएगा जिससे आगे चलकर वो और भी निर्मम कृत्य करे। क्या आदर्श प्रस्तुत कर रही है हमारे देश की अदालत उन समस्त नाबालिग़ (तथाकथित) अपराधियों के समक्ष कि बच्चे! तुम अभी छोटे हो, जितने चाहो अपराध करो,  तुम्हें माफ़ है। या क्या आदर्श प्रस्तुत किया जा रहा है उन बेटियों के समक्ष कि तुम्हारे साथ कुछ भी हो जाए, तुम्हारी जान ही क्यों न चली जाए, लेकिन हम तुम्हारे अपराधी को बच्चा समझ के छोड़ देंगे। 

मैं भी समझती हूँ कि अपराधी की उम्र मायने रखती है, लेकिन क्या  उसका अपराध मायने नहीं रखता? छोटी-मोटी चोरी नहीं की है उसने। पूरे होशो-हवास में अपराध किया है उसने और बाकी के चारों को भी प्रेरित किया है। ये छोटी बात नहीं है माननीय न्यायाधीश जी। वो ही घिस-पिटा सवाल एक बार और कि अगर ऐसा आपकी या देश के किसी बड़े रसूखदार की बेटी के साथ हुआ होता तो भी क्या उसे यूँ ही सुधार गृह भेज दिया जाता?

बड़ी उम्मीद थी, लेकिन हुआ कुछ भी नहीं। 'निर्भया', नम आँखों से क्षमा मांगते हैं तुमसे और गुज़ारिश करते हैं  "न आना इस देश मेरी लाडो"। 

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

संयम की बात - तेज़ वाहन चलाने वालों से

मित्रों,
कल जन्माष्टमी  तैयारियों में व्यस्त रही दिन भर, तमाम बातें मथती रहीं मस्तिष्क को, लेकिन हाथ  तो दो ही हैं न; लिखना संभव नहीं हो पाया। जन्माष्टमी यानि उस कृष्ण का जन्म जिसने हमें सिखाई मानवीयता, पराक्रम, जीवन-दर्शन और भी न जाने कितनी महत्त्वपूर्ण बातें। इनके अंतर्गत एक बेहद महत्त्वपूर्ण बात 'संयम' जिस पर आज की मेरी ये पोस्ट आधारित है। संयम का हर क्षेत्र में बेहद महत्व है घर में, ऑफिस में, रोड पर, मार्केट में, ख़ास तौर पर हमारे व्यवहार में। संयम एक ऐसा शस्त्र है जिसके द्वारा हम अपने से अधिक बलवान को परास्त कर सकते हैं।

आज संयम की बात उन लोगों से जिन्हें अपने गन्तव्य तक बहुत जल्दी पहुंचना होता है, यानि तेज़ वाहन चलाने वालों से। मित्रों, एक बात हमेशा याद रखें कि आप भी इंसान हैं, चूक आपसे भी हो सकती है; और ये चूक बहुत भारी भी पड़ सकती है आप पर।  आपका जीवन बेहद मूल्यवान है, आपके लिए भी और आपके अपनों के लिए भी। वाहन तेज़ चलाने के अलावा भी एक सुरक्षित उपाय है समय से गंतव्य पर पहुँचने का - कुछ मिनट पहले निकलिए, आप समय से और सुरक्षित अपने गंतव्य पर पहुँच जायेंगे।

मित्रों, कुछ मिनट देर से पहुंचेंगे तो हो सकता है आपका कुछ नुक्सान हो किन्तु जल्दी पहुँचने की कोशिश में अगर आपको चोट पहुँचने की सम्भावना भी है तो 'दुर्घटना से देर भली'। जीवन एक बार मिलता है, उसे यूँ ही दाँव पर न लगाना ही बुध्धिमानी है, क्योंकि मित्रों 'ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा'। तो समय का ख़याल रखें और उससे भी ज्यादा अपने आप का ख़याल रखें।

शुभकामनाएँ।  

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

पहल - मेरी तरफ से

मित्रों,
कभी-कभी ऐसा होता है कि हमारा जीवन एक ही ढर्रे पर चलता जाता है और हम लगभग संतुष्टि  का भाव लिए उसी ढर्रे  घिसटते रहते हैं। ये एक बेहद खतरनाक अवस्था होती है मित्रों, जिसमें हमारी साँसें तो चल रही  होती हैं लेकिन हमारा मस्तिष्क सुप्तावस्था  जाता है। तो इससे पहले कि सुप्तावस्था से हम मृतावस्था पहुँच जाएँ, उठिए और अपने दिमाग पर चढ़ी गर्द झाड़िए।  कितना कुछ हो रहा है हमारे आस-पास, हमारे समाज में, हमारे अपने देश में मानवता  खिलाफ़ और हम अपने आप से ही नहीं उबर पा रहे!

मित्रों, अपने लिए, अपने बच्चों, अपने परिवार के लिए तो जानवर भी जीते हैं, उनकी सुविधा-असुविधा का ख़याल रखते हैं।  अब समय है अपने समाज, अपने देश के प्रति अपने कर्त्तव्यों को पूरा करने का। मानती हूँ कि इसी कारण हमारे लोकतंत्र में नेताओं को चुना जाता है, ये काम उन्हें सौंपा जाता है; लेकिन उसे कार्य सौंपने के बाद हमें उस तरफ से अपनी आँखें तो नहीं बंद कर लेनी चाहिए न।  अगर वो ठीक से अपना कार्य नहीं कर रहा है तो हमें ही सिखाना होगा न उसे ?

मित्रों, समय है अपने घर की गन्दगी खुद साफ़ करने का। आखिर घर(देश) हमारा है तो  ज़िम्मेदारी हमारी भी तो बनती है !! तो मित्रों, शुरू हो जाइये, अपना सही माध्यम चुनिए जिसमें आप सहज महसूस करें, और जुट जाइये सफाई अभियान में। मैं ये नहीं कहती कि आप के अकेले के बस की बात है ये, लेकिन किसी को तो शुरुआत करनी पड़ेगी न। तो हम क्यों नहीं? क्यों हम किसी और से उम्मीद करें ? और मित्रों यकीनन शुरुआत में भले आप अकेले हों लेकिन ज्यों-ज्यों आप कदम बढ़ाएंगे कारवाँ खुद ब खुद बढ़ता जाएगा।

मैं आपके साथ हूँ।
 
शुभकामनाएँ 

रविवार, 25 अगस्त 2013

आस्था बनाम अंधविश्वास

मित्रों,
पहले बता दूं  कि ये पोस्ट किसी के समर्थन या विरोध के लिए नहीं है। ये फिलहाल सिर्फ और सिर्फ आसाराम बापू के लिए लिखी गयी है लेकिन ऐसे और भी हैं। 
 इसे मैंने इसलिए लिखा है क्योंकि मुझे लगता है कि आस्था की आड़ में हमें छला जा रहा है और इसके लिए किसी और से ज्यादा हम ख़ुद दोषी हैं। हम लोगों की मानसिकता ऐसी हो गयी है कि जो कोई भी धर्म की बात करता है, हम आँख बंद करके उसके पीछे चल देते हैं बिना किसी तार्किकता के।  ये कौन लोग हैं जिनकी हर बात हमारे लिए पत्थर की लकीर होती है, जो कुछ भी करते हैं हम बिना उसकी प्रामाणिकता पर विचार किये उसे मान लेते हैं? मैं हर धर्मगुरु की बात नहीं करती लेकिन अधिकाँश हमारे भोलेपन का फायदा उठाते हैं।

मित्रों, मेरा मानना है कि अगर हमें आस्था ही रखनी है तो धर्मगुरु क्यों? वो  परमात्मा क्यों नहीं जिसके ये लोग एजेंट बने फिरते हैं? (क्षमा करें अगर किसी की भावना को ठेस पहुंची हो तो) अगर ज्ञान ही अर्जित करना है तो हमारी धार्मिक पुस्तकें क्या कम हैं जिन्हें सामने रखकर ये उनका अपमान करते हैं।

मित्रों, सोचें ज़रूर और अगर मेरी बात सही लगे तो कृपया खुद को और आपसे जुड़े उन तमाम लोगों को अंध-आस्था के गर्त में गिरने से बचाएँ जिनकी आपको परवाह है।

तो मित्रों, सतर्क रहें, आस्था ज़रूर रखें लेकिन अंधविश्वास से बचें।
शुभकामनाएं, शुभ-रात्रि। 

शनिवार, 24 अगस्त 2013

तलाश - मुझ में मेरी

मित्रों,
आज सुबह से थोड़े से समय की तलाश में थी कि कुछ लिख सकूं, अब जा कर समय मिला है।  कितने व्यस्त होते हैं  न हम पूरे दिन अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने में! सुबह बड़ी बेटी को स्कूल भेजने के लिए उसे तैयार करना, टिफिन बनाना, उसके स्कूल जाने के बाद साफ़-सफ़ाई करना, नाश्ता बनाना, छोटी बेटी के सो कर उठने के बाद उसके आगे-पीछे भागना, खाना बनाना और भी न जाने क्या-क्या कि अगर सबका ज़िक्र करूँ तो पूरा पेज़ ही भर जाएगा। आपको नहीं लगता की परिवार की ज़रूरतों को पूरा करते-करते हम अपनी ज़रूरतों को भूल बैठे हैं? आपको याद है आखरी painting आपने कब बनायी थी?  या आखरी कविता/कहानी आपने कब लिखी थी? या आखरी बार अपने पसंदीदा लेखक की पुस्तक कब पढ़ी थी? याद नहीं आएगा आपको, क्योंकि  ये   सब बातें आपको अब गुज़रे ज़माने की लग रही हैं। अगर ऐसा है तो अभी चेत जाइये क्योंकि अनजाने में हमने अपने आपको कहीं खो दिया है। अब समय आ गया है अपने आप को तलाशने का।
मित्रों, आइये समय निकालें और ख़ुद से रूबरू  हों। यकीनन अपने उन भूले हुए शौक़ को पूरा करते हुए आप पहली बार अपने आप को इतना खुश पाएंगी। इसका अर्थ ये नहीं कि हम अपनी जिम्मेदारियों को पूरा न करें, बल्कि उन सबके साथ ताल-मेल बिठा कर अपने शौक़ पूरे करें।
शुरुआत करें सबके साथ-साथ अपने लिए भी जीने की।
शुभकामनाएँ।  

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

चिंता-चिंतन

मित्रों,
आज मन बड़ा व्यथित है कुछ घटनाओं को सुन-पढ़ कर। सोचती हूँ क्या मानसिकता  होती होगी उन लोगों की जो महिलाओं को  सिर्फ़ उपभोग की वस्तु समझते हैं, उनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं, उन्हें तकलीफ पहुंचाते हैं और इस में अपना सुख तलाशते हैं, अपने अहं की तुष्टि करते हैं। कहाँ से आती है ये सोच या सिर्फ़ ये उनका inferiority complex है?
वैसे इसको समझने के लिए हमें अपने अन्दर झांकना होगा।  क्या हम अपने बच्चों को ऐसे संस्कार दे रहे हैं जिसमें दूसरों की इज्ज़त करना, उन्हें सम्मान देना सिखाया जाता है? जैसे हमारे बुज़ुर्ग हमें सिखाते थे कि कैसे हमारे घरों में काम करने वालों को भी इज्ज़त दे कर पुकारा जाता था - माली काका, महरी चाची, आदि। क्या हम उन्हें ऐसे स्कूल में पढ़ा रहे हैं जहाँ मानवीय मूल्यों को सिखाया जाता है?
इस सोच को backward या पुरातनपंथी सोच  मत समझें मित्रों। ये ही हमारी संतानों को  इंसान बनाएगी। अभी चेत जाइये नहीं तो ऐसी घटनाओं के लिए कहीं न कहीं हम ही ज़िम्मेदार होंगे।
शुभ-रात्रि

सोमवार, 19 अगस्त 2013

शुरुआत

बड़े दिनों से सोच रही थी कि कुछ लिखूं , आज हिम्मत जुटा कर शुरुआत कर रही हूँ.