शनिवार, 19 सितंबर 2020

समाज सेवा

 सेवक राम जी के बड़े चर्चे थे आजकल पूरे कानपुर में। क्यों ना होते, वह काम ही इतना अच्छा कर रहे थे। कोरोना काल में सफेद धोती कुर्ता पहने काले मास्क में जब लोगों को राशन के पैकेट पकड़ाने अपने घर के बाहर लगे स्टाल में खड़े होते तो उनके लिए लोगों के मन में दुआएं ही होतीं। पिछले 25 मार्च से ही उन्होंने यह धर्म कार्य या यूं कहें तो मानवता कार्य शुरू कर दिया था। बिना 1 दिन का नागा किए कम से कम 2000 लोगों को राशन या भोजन वितरण करते हैं वे। लोग दुआएं देते नहीं अघाते।

 लेकिन पिछले दो-तीन दिन से कुछ बेचैन लग रहे हैं सेवक राम जी। जाने कितने दिनों से एक महिला दोपहर 3:00 बजे के आसपास आकर लाइन में लगकर राशन लेकर जा रही थी। उसकी आंखें इस दौरान सेवक राम जी पर ही टिकी रहतीं लेकिन जैसे ही वह उसकी ओर देखते, वह नजरें चुराने लगती। मास्क की वजह से उसे पहचानना भी मुश्किल था। आज उन्होंने पूछ ही लिया - "बहन! आप जाने क्यों जानी पहचानी लग रही हैं। आप मुझे भी किसी परिचित की ही नजर से देखती हैं ऐसा लगता है। क्या आप अपना परिचय देंगी?" महिला ने कहा - "रहने दीजिए सर। जरूरतमंद हूं इसलिए राशन लेने आई हूं। अगर आपको कोई समस्या हो तो कल से नहीं आऊंगी। ये सब बातें सुनकर लाइन में लगे और लोग भी सेवक राम जी को अजीब नजरों से देखने लगे। सेवक राम जी ने झेंपते हुए कहा - "नहीं बहन! यह आपका हक है। आप कृपया ले जाइए।" महिला राशन लेकर जैसे ही मुड़ी, उसने पसीना पोंछने के लिए अपना मास्क उतारा और अनायास ही पीछे मुड़ी। सेवक राम जी से नजरें मिलते ही सेवक राम जी अवाक रह गए। यह उनकी 12 फैक्ट्रियों में से एक में कार्यरत सुपरवाइजर थी, जिनकी तनख्वाह कोरोना काल की वजह से आधी कर दी गई थी।

 लौटती हुई उस महिला का हर कदम जैसे सेवक राम जी के सीने पर पड़ रहा था....

- श्यामली