मंगलवार, 24 अक्टूबर 2023

दशहरे पर किस रावण का दहन करें?

 

दशहरा हम हिंदुओं का बहुत ही बड़ा पर्व है। इस दिन बुराई रूपी रावण का अच्छाई रूपी श्रीराम द्वारा वध किया जाता है। हम सभी इस दृश्य को देखने अवश्य जाते हैं एवं रावण वध की खुशियां मनाते हैं। 

क्या हमने कभी सोचा कि आज इतने वर्षों बाद भी हम रावण दहन क्यों करते हैं? रावण तो श्री राम के हाथों त्रेता युग में ही मार दिया गया था, फिर आज भी क्यों?

दरअसल हम इंसान स्वयं में ही राम एवं रावण को समाहित किए हुए हैं। न हम पूरी तरह से राम हैं और न पूरी तरह से रावण। रावण होने का अर्थ है अपने अंदर कई दुर्गुणों का होना, जैसे गुस्सा, अहंकार आदि। तो अपने इन दुर्गुणों को धीरे धीरे अपने अंदर के राम द्वारा खात्मा कराकर ही हम बेहतर इंसान बन सकते हैं। अब दुर्गुण इतने हैं कि कोई एक चुटकी बजाने से तो खत्म होने से रहे। खुद को बेहतर बनाते रहना एक सतत प्रक्रिया है। इसी प्रक्रिया के तहत हमें अपने अंदर के रावण पर विजय प्राप्त करनी है। 

हर विजय दशमी पर यदि हम अपने अंदर के एक दुर्गुण को भी खत्म करने का प्रण लें, तो हम इंसानियत में थोड़े से राम के निकट हो जाते हैं। बस यही कारण है कि वर्ष दर वर्ष हम अपने अंदर के दुर्गुणों को खत्म करते रहें और बेहतर इंसान बनते रहें इसलिए दशहरा मनाना चाहिए।

तो आज जब रावण का दहन देखने जाइए तो अपने अंदर के थोड़े से रावण की भी आहुति देते आइए।

शुभम् भवतु।

- श्यामली 

सोमवार, 2 अक्टूबर 2023

गांधी - वर्तमान में प्रासंगिकता

 

गांधीजी की आज के समय में प्रासंगिकता को जानने के लिए पहले गांधीजी को जानना आवश्यक है। 

गांधी कौन?

• गांधी वो जिसने अन्याय के खिलाफ़ आवाज उठाना सिखाया।

• गांधी वो जिसने लोगों का सत्य और अहिंसा में विश्वास जगाया।

• गांधी वो जिसने स्वदेशी अपनाना सिखाया।

• गांधी वो जिसने धर्म, जाति और ऊंच नीच का भेद मिटाया।

• गांधी वो जिसने अपने देश, अपनी मातृभूमि पर गर्व करना सिखाया।

• गांधी वो जिसने स्वच्छता का पाठ पढ़ाया।


ये सब बातें जो उन्होंने सिखाईं बताई, क्या आज प्रासंगिक नहीं हैं? कोई हमारे साथ कुछ भी अन्याय करे, यदि हम आवाज नहीं उठाएंगे, आप विरोध नहीं करेंगे तो हमारा शोषण होता रहेगा और उसके जिम्मेदार हम खुद होंगे।

वहीं यदि हम सत्य को नहीं अपनाएंगे, असत्य के गुलाम बने रहेंगे तो हम जानते हैं कि कभी भी अपनी स्वयं की नज़रों में उठ नहीं पाएंगे क्योंकि हमारी अंतरात्मा जानती है कि सत्य का रास्ता ही वास्तविक रास्ता है। 

वैसे ही यदि हम किसी को हानि पहुंचाएंगे तो खुद की भी हानि होने के लिए तैयार रहना होगा और इससे कभी भी किसी का भी भला नहीं हो सकता। सही कहा गया है कि तलवार के जवाब में तलवार ही उठाएंगे तो सिर्फ तलवारें ही बचेंगी। तात्पर्य ये है कि अहिंसा के रास्ते ही हमें किसी समस्या का समाधान मिल सकता है। 

स्वदेशी अपनाने से तात्पर्य है कि यदि हम विदेशी वस्तुओं का उपयोग करेंगे तो फायदा विदेशियों का होगा और अपने देशवासियों का नुकसान। हमें हमेशा स्वदेश में बनी हुई वस्तुओं का उपयोग करना चाहिए जिससे हमारे देश वासियों को रोजगार भी मिलेगा और देश की आत्मनिर्भरता भी बढ़ेगी, आयात के खर्चे भी कम होंगे।

गांधीजी ने हर धर्म हर समुदाय के लोगों को गले से लगाया। उनके अनुसार हम सभी एक ही ईश्वर की संतानें हैं तो ये भेदभाव क्यों? यदि हम आज भी भेदभावों से दूर हो कर सबको समान समझेंगे तो वे भी हमारा सम्मान करेंगे एवं हमारा पूर्ण रूप से सहयोग करेंगे।

गांधीजी ने ये भी सिखाया कि हमें अपनी मातृभूमि पर गर्व करना चाहिए। आज बहुत से लोग अपने ही देश की बुराई करते हैं और बाहरी देशों की तारीफ करते हैं। हो सकता है कि हमारे देश में कुछ कमियां हों, तो उन कमियों को ठीक करना हमारा ही दायित्व है और हमें अपने दायित्व से भागना नहीं चाहिए। यदि हमारे घर में कोई समस्या आ जाती है तो हम उसकी मरम्मत करते हैं, ना कि घर को कोसते हुए उसे छोड़ कर चले जाते हैं। इसी लिए हमें अपने देश में रहकर उसके उत्थान में अपना सहयोग देना चाहिए। 

गांधीजी ने हमें स्वच्छता का पाठ पढ़ाया। ऐसा नहीं है कि उन्होंने कभी इस बारे में सिर्फ ज्ञान दिया था, वो हमेशा अपने आश्रम की साफ सफाई खुद ही करते थे। उनका मानना था कि संपूर्ण स्वास्थ्य का रास्ता स्वच्छता से हो कर ही गुजरता है। यदि हम साफ सफाई का ध्यान रखेंगे तो स्वयं भी स्वस्थ रहेंगे और अपने आसपास के वातावरण को भी स्वस्थ रख सकेंगे।


फिर भी क्यों इतना विरोध?


• सत्य का रास्ता बहुत ही मुश्किल होता है अतः हम मानने से कतराते हैं।

• हम डरते हैं कि यदि हम अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएंगे तो हमारे साथ कुछ गलत हो सकता है। इस डर से हम अन्याय सहते जाते हैं, अपना शोषण करवाते हैं।

• विदेशी वस्तुएं फैशन में हैं और स्वदेशी पुरातन पंथी लगती हैं। विदेशी वस्तुओं को अपनाने वाले उच्च स्तरीय माने जाते हैं।

• हमारे अंदर सहनशीलता की कमी है और हम ईंट का जवाब पत्थर से देना पसंद करते हैं भले ही सामने वाला जवाब में और बड़ा हथियार ले कर खड़ा हो जाए।

• हमारा मानना है कि स्वच्छता का खयाल रखना एक विशेष समुदाय का काम है और हम अगर साफ सफाई ही करते रहेंगे तो अपने काम कब करेंगे।

• सबसे बड़ा कारण - व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का अधकचरा ज्ञान। लोग अपनी सुविधा के अनुसार चीजों को सही या गलत ठहराते हैं। कहते हैं ना कि हम दूसरों के लिए बेहतरीन जज हैं और अपने लिए बेहतरीन वकील।

• हम उनके द्वारा लिए गए फैसलों को आज के समय के हिसाब से देखते हैं और उन्हें गलत ठहराते हैं। हम भूल जाते हैं कि उस समय का भारत अलग था, उसकी चुनौतियां अलग थीं। हम भूल जाते हैं कि उनके फैसलों पर सवाल उठाने का अधिकार भी उसी आजादी की वजह से हमें मिला है जिसके लिए उन्होंने अपनी ऐश ओ आराम की जिंदगी को त्याग दिया था।


यदि सवाल हों तो क्या करें?


पहले तो गांधी को पढ़ें, उनके बारे में देश विदेश की महान विभूतियों के विचार पढ़ें, किसी पढ़े लिखे व्यक्ति से परिचर्चा करें। 


मजबूती का नाम महात्मा गांधी 

भारत माता की जय।


- श्यामली

गुरुवार, 14 सितंबर 2023

हिंदी दिवस मनाना क्यों आवश्यक है?

 

आज १४ सितंबर यानि हिंदी दिवस है। आज हम हिंदी दिवस इसलिए मनाते हैं क्योंकि आज के ही दिन इसे राज भाषा का दर्जा प्राप्त हुआ।

हिंदी दिवस इसलिए नहीं मनाया जाता कि आज के ही दिन हम हिंदी में वार्तालाप करें और हिंदी होने का आडंबर करें। वास्तविकता यह है कि आज के समय में अंग्रेजी ही विश्व स्तर पर वार्तालाप का माध्यम है अतः अंग्रेज़ी का ज्ञान बहुत ही आवश्यक है। यदि हम अंग्रेज़ी या अन्य किसी विश्वस्तरीय भाषा के ज्ञाता हैं तो निश्चित ही ये गर्व की बात है। किंतु किसी भी कारण से हमें अपनी मातृभाषा हिंदी से विमुख नहीं होना चाहिए। आज हो ये रहा है कि हमारे मानसिक ज्ञान के स्तर का मूल्यांकन इस धरातल पर हो रहा है कि हमें अंग्रेजी आती है या नहीं, हम अंग्रेज़ी के शब्दों का भली भांति उच्चारण कर पा रहे हैं या नहीं। यदि हम अंग्रेज़ी कुछ कम जानते हैं, वार्तालाप हिंदी में करते हैं तो हमें हेय दृष्टि से देखा जाता है। हम स्वयं शायद इसी कारण से अपने आपको निम्न समझने लगते हैं कि हमें अंग्रेजी कुछ कम आती है या नहीं ही आती। होना ये चाहिए कि दूसरी भाषाओं के ज्ञाता होना अच्छी बात है परंतु हिंदी भाषी होने पर हम हीन भावना से ग्रसित न हों। जिस प्रकार दूसरे देशों के लोग अपने देश की भाषा को अधिक महत्व देते हैं उसी प्रकार हमें भी हिंदी भाषा को महत्व देना चाहिए। हमारी भाषा वह भाषा है जिसने जाने कितनी भाषाओं के शब्दों को स्वयं में आत्मसात किया है। अतः हमें हिंदी भाषी होने पर सदैव गर्व होना चाहिए। 

अंग्रेज़ी या अन्य भाषा का प्रयोग वहां करना चाहिए जहां आवश्यक है। यदि कोई हमारी भाषा समझने में असमर्थ है तो हम अंग्रेज़ी में बात करके उसे अपनी बात समझा सकते हैं। किंतु हिंदी भाषियों के आपस में अंग्रेज़ी में बात करने का तात्पर्य समझ से परे है।

ये सच है कि आज शिक्षा के लिए अंग्रेज़ी का ज्ञान आवश्यक है क्योंकि अधिकतर हम अंग्रेज़ी माध्यम  पढ़ते या पढ़ाते हैं। किंतु सामान्य बोलचाल की भाषा हमारी मातृभाषा ही होनी चाहिए और बच्चों को उसे लिखना पढ़ना भी भली भांति सिखाया जाना चाहिए। आज हो ये रहा है कि बच्चे अपनी मातृभाषा की ही मात्रा पाई नहीं समझते। बच्चे तो बच्चे बड़े तक कई बार हिंदी के कुछ क्लिष्ट शब्दों को पढ़ने, लिखने में खुद को असमर्थ पाते हैं। इसका कारण है कि हम हिंदी कम लिखने पढ़ने लगे हैं। अखबार, पत्रिकाओं का चलन कम हो चला है। इसीलिए इस ओर ध्यान देना अति आवश्यक है। अन्य भाषाओं के प्रेम की वजह से हमें अपनी मातृभाषा से विमुख नहीं होना चाहिए।

हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 

शनिवार, 21 जनवरी 2023

बाल मन -२

भाग- २


अक्सर हमने लोगों को ये कहते सुना है कि बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं, हम जैसा ढालेंगे, वो ढल जाएंगे। और हम उस कुशल कुम्हार की भांति उसे बेहतरीन बनाने में लग जाते हैं… मगर क्या ये सही है?

जैसे कुम्हार मिट्टी को अपनी कल्पना अपनी कुशलता अपनी ज़हीनियत के हिसाब से गढ़ता है, हम अपने बच्चे को अपनी कल्पनाओं, अपनी कुशलताओं, के हिसाब से गढ़ने लगते हैं। हम अक्सर खुद जिन सपनों को पूरा नहीं कर पाते, वो सपने अपने बच्चों के माध्यम से पूरा करने की कल्पनाओं में खोए उसे उसी राह पर चलाने की कोशिश करते हैं। जाने अंजाने ही सही, हम उसे वो ही रास्ता दिखाने की कोशिश करते हैं जो हमें सही लगता है। 

हम अक्सर ये भूल जाते हैं कि हमारी, हमारी सोच, हमारी कुशलताओं की भी सीमा है…. ये आवश्यक नहीं कि जो हमें सही लग रहा हो वो ही सही हो हमारी संतान के लिए। उसकी अपनी सोच, उसकी अपनी कुशलताएं, उसकी अपनी अलग दृष्टि या विचारशीलता हो सकती है, उसकी अपनी सीमाएं हो सकती हैं ये हमारे मस्तिष्क में ही नहीं आता।

' बच्चा कच्ची मिट्टी नहीं है, इंसान है … वो भी भरे पूरे दिमाग के साथ' ये याद रखना अति आवश्यक है। उदाहरण स्वरूप अक्सर हम बादलों में कुछ आकार देखते हैं … सबको अलग अलग आकार दिखते हैं अपनी कल्पना के अनुसार। लेकिन जैसे ही कोई एक किसी विशेष आकार का नाम ले लेता है, बाकी लोग भी अपनी कल्पना को उसी की तरफ एकीकृत करने की कोशिश करने लगते हैं, अंत में सबको वो ही आकार दिखने लगता है। यहां पर बाकी सबकी कल्पनाओं को उस एक की कल्पना ने धूमिल कर दिया। असल में ऐसा ही होता है। हम अपनी सोच को एक बड़े, अभिभावक, अधिक अनुभवी की तरह बच्चों की तरफ प्रेक्षित करते हैं एवं बच्चे अनुयायी की तरह उसी को सही मानने लगते हैं। हमारे घरों में चली आ रही पुरातन प्रथाएं (यहां सही गलत की बात नहीं हो रही) इसी का उदाहरण हैं। कुछ बच्चे जो बचपन में तार्किक होते हैं, या जिनके अभिभावक उन बच्चों की सोच को भी महत्व देते हैं, आगे जा कर तार्किकता के आधार पर सही प्रथाओं को मानते हैं एवं गलत प्रथाओं को दरकिनार कर देते हैं।

हम माता पिता दरअसल चाहते क्या हैं?

हर अच्छा अभिभावक चाहता है कि उसकी संतान दुनिया में सफलता प्राप्त करे, अच्छी नौकरी हो या बहुत सफल व्यवसाय हो, खूब धन दौलत हो, ऐश -ओ -आराम का जीवन हो। हम कुछ भी सामान्य नहीं चाहते अपनी संतान के लिए, बेहतरीन चाहते हैं। और इस चाह के चलते किसी कठिनतम लक्ष्य को उसकी कल्पनाओं में बसाने लगते हैं (डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस, पीसीएस वगैरह वगैरह)। हम ये मानना ही नहीं चाहते कि हमारा बच्चा साधारण भी हो सकता है। हम ये मान ही नहीं पाते कि जिस बच्चे को हम इंजीनियर बनाने की कोशिशों में लगे हैं, उससे अधिक से अधिक अंकों को प्राप्त करने के लिए जी तोड़ मेहनत करवा रहे हैं, हो सकता है उसके अंदर कोई कलाकार छुपा हो, कोई लेखक छुपा हो। पढ़ाई में वो मन लगाने की पूरी कोशिश करता हो निस्संदेह, लेकिन उसकी अपनी सीमाएं हैं, क्षमताएं हैं। हम ये भूल जाते हैं कि हम (अधिकतर अभिभावक) खुद भी औसत ही रहे हैं और अपनी संतान को घोड़े की तरह हांक रहे हैं अंकों की रेस जीतने के लिए। नतीजतन हो सकता है 5% बच्चे उस लक्ष्य को पाने में सफल हो भी जाएं तो ये गारंटी नहीं है कि वो उसी लक्ष्य के साथ ही आगे बढ़ें। हमारे समक्ष ऐसे कई डॉक्टरों, इंजीनियरों के उदाहरण हैं जो गायन, नृत्य, अभिनय, चित्रकारी वगैरह में सफल हुए हैं, सफल नहीं भी हुए तो भी खुश हैं अपने मन माफिक कैरियर में। 

लेकिन उनका क्या जो अपनी उस लक्ष्य (जिसको पाने का अथक प्रयास किया) को पाने की अक्षमता (कारण कोई भी हो) की वजह से न वो लक्ष्य पा पाते हैं, न ही अपनी दूसरी योग्यताओं (जिनको संवारने के लिए कुछ नहीं किया) के साथ आगे बढ़ पाते हैं। बड़े सारे ऐसे बच्चे परिस्थितियों से समझौता करके साधारण कैरियर अपना लेते हैं और अपने बच्चों द्वारा अपने सपने पूरे किए जाने की आशा में जीवन बिताने लगते हैं।

लेकिन वो बच्चे जो अपनी असफलताओं से समझौता नहीं कर पाते, अक्सर कुंठित हो जाते हैं। अपने साधारण कैरियर के साथ समझौते की कोशिशों में अक्सर व्यसनों में अपने आपको उलझा लेते हैं या समाज से कटे कटे से रहने लगते हैं और किसी तरह से अपना जीवन व्यतीत करते हैं।

क्या करें?

हमें पहले तो ये समझना होगा कि बच्चा एक इंसान है जिसकी अपनी सोच, अपनी क्षमताएं, अपना एक बड़ा सा कैनवास है। हमें करना ये है कि उसके उस खाली कैनवास में उसे ही रंग भरने देना है, वो भी उसकी अपनी पसंद के रंग। हमें उसकी क्षमताएं समझनी हैं एवं उसे खुद ही बढ़ने देना है। एक छोटे बच्चे को जब पानी में तैरना सिखाते हैं तो उसे पानी में छोड़ दिया जाता है जिससे वो तैरना खुद ब खुद सीख लेता है। बस करना ये है कि उसे डूबने नहीं देना है। उसे उसके हिसाब से बड़े होने देना है, उसका साथ देकर, उसका ड्राइवर बन कर, उसके अपने चुने रास्ते पर। हां, उस रास्ते की अच्छाइयां, बुराइयां जरूर बताएं जिससे वो आगे आने वाले संघर्षों के लिए तैयार रहे। उसके साथ चलें लेकिन सहारा बनकर नहीं क्योंकि जिन्हें सहारे की आदत हो जाती है वे अपने दम पर कुछ नहीं कर पाते। उसमें अपना विश्वास जताएं, उसे ये विश्वास दिलाएं कि यदि इरादे नेक हों और कोशिशें ईमानदार हों तो कोई भी मंज़िल हासिल की जा सकती है और वो ये हर हाल में कर सकता है। यकीन जानिए यदि हम अपने बच्चे के साथ मालिक की तरह नहीं वरन एक सह जीवी की तरह बर्ताव करेंगे तो वो कुछ और बने न बने एक सफल इंसान अवश्य बनेगा, जो सही अर्थों में खुश होगा और ये ही उसकी और हमारी कामयाबी होगी।

शुभम् भवतु।

२१-०१-२०२३


गुरुवार, 12 जनवरी 2023

बाल - मन

  भाग - १


जन्म लेते ही जब बच्चा बोल भी नहीं पाता, सिर्फ उसके हाव भाव से उसे, उसकी जरूरतों को समझना नए बने माता - पिता के लिए बेहद मुश्किल है और एक बड़ी उपलब्धि के समान है। मैंने देखा भी है एवं महसूस भी किया है कि जब बच्चा आपकी सिखाई हुई किसी चीज को करता है, उस बच्चे से अधिक उसके माता पिता खुश होते हैं, उत्साहित हो जाते हैं जैसे कोई बड़ी उपलब्धि मिल गई हो। उदाहरण स्वरूप जब बच्चा पहली बार मां या पापा कहता है, माता पिता की खुशी देखते ही बनती है। वो ही एक समय होता है जब हम माता पिता अपनी खुशी के आगे ये देखना भूल जाते हैं कि हमें खुश देख कर बच्चा भी बहुत खुश होता है। हम उसमें अपनी उपलब्धि तो देखते हैं लेकिन ये समझना भूल जाते हैं कि उस बच्चे की ये कितनी बड़ी उपलब्धि है। यहीं से, इसी समय से ज़रूरी हो जाता है चाइल्ड साइकोलॉजी को समझना।

अधिकतर ये होता है कि छोटा बच्चा जो बोल नहीं पाता, जब रोता है तो हम ये समझते हैं कि उसे भूख लगी है या कहीं दर्द हो रहा है। लेकिन क्या हम ये सोच पाते हैं कि हो सकता है वो आपका attention, आपका ध्यान अपनी तरफ चाहता हो। हो सकता है वो चाहता हो कि आप अपना समय उसे दें। ये भी समझने की आवश्यकता है, ऐसे भी सोचना चाहिए हमें। 

हालांकि आज के समय में जब माता पिता दोनों वर्किंग हैं, थोड़ा मुश्किल जरूर होता है कि अधिक से अधिक समय अपने बच्चे को दें लेकिन ये बात वो छोटा सा बच्चा नहीं समझ सकता उसे तो अपने माता पिता की ज़रूरत है ही। लेकिन हम क्या करते हैं? उसे आया या दादा दादी या नाना नानी यहां तक कि क्रेच में छोड़ देते हैं। ऐसा करके हम बच्चे को समझौता करना सिखाते हैं जिससे होता क्या है? बच्चा प्यार पहचानता है, जिससे अधिक मिलेगा उसके नज़दीक रहना चाहेगा, आपसे अधिक मिलेगा तो आपके पास वरना दादा दादी, नाना नानी या आया के पास रहना पसंद करेगा और भावनात्मक रूप से शायद आपसे थोड़ा सा दूर हो जाएगा, (क्रेच से तो शायद ही कोई बच्चा भावनात्मक रूप से जुड़ता हो)। धीरे धीरे उसके व्यवहार में कुछ कुछ बदलाव होने लगता है। अच्छा है तो ठीक लेकिन ये व्यवहार अच्छा नहीं है तो क्या हम इस बदलाव को  महसूस करते हैं? शायद नहीं, कभी कभी करते भी हैं तो नज़र अंदाज़ कर देते हैं और कभी कभी समझते भी हैं लेकिन ये समझ नहीं पाते कि क्या करें। कभी कभी या अक्सर ये होता है कि हमारे बुज़ुर्ग या आया बच्चे से लाड़ प्यार में या बच्चे के रोने के डर से उसकी हर बात मान लेते हैं। अब बच्चा इतना छोटा होता है कि उसे पता नहीं होता की क्या सही है और क्या गलत, उसे तो हर वो चीज़ करनी है को उसे पसंद है और वो माता पिता से दूर होने की सहानुभूति का फायदा उठा कर अपने संरक्षक से किसी भी तरह से अपनी बात मनवा लेता है। यहीं से शुरुआत होती है बदलाव की जिसकी वजह से बच्चा जिद्दी हो जाता है और अगर कभी उसकी बात नहीं मानी जाती तो वो चिड़चिड़ा हो जाता है। आदतें धीरे धीरे पड़ती हैं, शुरुआत में ही अगर उसके व्यवहार में होते बदलाव को समझ कर अगर हम सुधार के कुछ उपाय नहीं करते तो फिर ये उसकी आदत में आ जाता है, जिसे बदलना बहुत ही मुश्किल हो जाता है। 

क्या करें - पहले तो बदलाव को पहचानें लेकिन किसी और बच्चे से तुलना मत करें। याद रखें कि हर इंसान की प्रकृति अलग होती है, तो दूसरों के साथ तुलना करके, उसकी तरह व्यवहार करने की शिक्षा देना इस समस्या का समाधान नहीं है। बच्चे से अधिक से अधिक बात करें, उससे समझें की उसका ऐसा व्यवहार क्यों है, उसे सही गलत उदाहरणों के माध्यम से समझाएं, महापुरुषों के बचपन की कहानियां सुनाएं, अपने बड़ों से सहयोग अवश्य लें। इतने सब के बाद भी अपने बच्चे को आपसे बेहतर कोई नहीं समझ सकता, तो उसकी हर समस्या को शांति से सुलझाएं। ज़रूरत पड़ने पर मनोवैज्ञानिक से संपर्क अवश्य करें। 

शुभम् भवतु।


12.01.2023