शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

शुक्रिया ......धन्यवाद......नमन

thank u......या शुक्रिया......या happy teacher's day...
बड़े छोटे शब्द लग रहे थे इसीलिए इतनी देर से लिखने बैठी कि जब भी लिखूँगी इत्मीनान से लिखूँगी .......
कहते हैं सबसे पहला शिक्षक हमारे जीवन में हमारी माँ होती है.....मेरे लिए भी मेरी माँ थी लेकिन उसके साथ, थे कई लोग ऐसे जिनहोने जाने अंजाने मुझे अनेकानेक रूप से शिक्षित किया .......मुझे बहुत कुछ सिखाया मेरी मौसी जिन्हें मैं मम्मी कहती थी और समझती भी थी .....क्या क्या सिखाया सब याद भी नहीं ....लेकिन एक गुण जो मैंने उनसे सीखा कढ़ाई ....मेरे मौसाजी जिनहे मैं दादा कहती हूँ उन्होने सिखाया स्व-अनुशासन और निर्भीकता.....मेरे पापा से मुझे जो गुण मिले वो हैं गायन और साहित्य की समझ.....मेरे बड़े भाई राजेश मिश्रा, जो मेरे आदर्श हैं .....मेरी बड़ी बहन सरला दीदी....जिनसे मैं बहुत डरती थी, लेकिन उन्हीं के पदचिन्हों पर चलना मेरी पहली पसंद था.....
इन सबको कभी मैंने एक छोटा सा thank you तक नहीं कहा .......लेकिन आज तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ इन सबकी क्योंकि वो संस्कार जो इन लोगो ने मुझे दिये, आज मैं अपनी बेटियों को भी वो ही संस्कार देना चाहती हूँ, और कोशिश भी कर रही हूँ.....
मैं बेहद शुक्रगुजार हूँ अपने तमाम उन शिक्षकों की जिन्होने मुझे शिष्या कम अपनी बेटी समझ कर शिक्षित किया .....
जीवन में हम जितने लोगो से भी मिलते हैं, कुछ न कुछ ज़रूर सीखने को मिलता है......शुक्रिया उन सभी लोगों का.......
नमन
भावपूर्ण नमन

गुरुवार, 4 सितंबर 2014

ये ज़िन्दगी

ये ज़िंदगी
कभी चलती हुई
कभी बंद पड़ी घड़ी...

ये ज़िंदगी
कभी सुनहरी सुबह
कभी सपनीली शाम...

ये ज़िंदगी
सरकती रेत 
मुठ्ठियों से...

ये ज़िंदगी
जो उगती है
तो ढलने के लिए ही...

ये ज़िंदगी
जो खिलती है
बिखरने के लिए ही...

ये ज़िंदगी
वो खिलौना
जिसे है टूटना एक दिन...

ये ज़िंदगी
कठपुतली
रब के हाथों की...

कोई कह दो ख़ुदा से-
न खेले इस तरह हमसे,
हमारी ज़िंदगी से

~श्यामली

शनिवार, 8 मार्च 2014

मैं कहाँ हूँ?

मैं कहाँ हूँ?

मेरा अस्तित्व तुमसे है,
मुझमें
मैं कहाँ हूँ?
ये तो तुम हो, मैं तो हूँ प्रतिबिंब जैसे हो तुम्हारा,
तुम्हीं से है मेरी पहचान,
लेकिन
मैं कहाँ हूँ??
तुम्हारे इर्द-गिर्द बस्ती है जैसे मेरी दुनिया,
मेरी दुनिया में लेकिन
मैं कहाँ हूँ?
तुम्हारे आवरण में छिप गयी हूँ
तुम्हारे दायरों में बांध गयी हूँ  ……
चाहती हूँ अपना एक आकाश,
अपनी दुनिया,
अपनी पहचान,
अपना अस्तित्व  ……
नहीं  .... तुमसे नहीं चाहती
नहीं  .......... तुमसे नहीं मांगूंगी
खुद बनाउंगी अपनी एक पहचान,
खुद सजाऊँगी अपनी एक दुनिया,
खुद उगाऊंगी अपने पंख  …… उड़ूंगी आसमान में,
खुद गढूंगी अपना एक अस्तित्व 
निकल कर दायरों से इठलाऊँगी
दिखाऊंगी
कि देखो
मैं यहाँ हूँ
देखो मैं यहाँ हूँ।
- श्यामली