शनिवार, 25 जून 2022

Generation Gap

"स्टॉप इट अवनी। एसी बंद करो। यह क्या है हर समय एसी चलाते हो? हमारे जमाने में हम छत पर खुली हवा में बैठते थे। कूलर चलाने के लिए पापा की परमिशन लेनी पड़ती थी। पंखा है, वह चला लो। यह आजकल के बच्चे ..... ईला बड़बड़ाती चली जा रही थी।
"जब देखो मोबाइल फोन हाथ में। जाने कौन से टाइप की पढ़ाई है? अरे हम भी पढ़ते थे, घर के सारे काम भी करते थे। मजाल है कभी खराब नंबर आए हों! हुंह" अवनी ने कान में इयरप्लग्स लगाकर फोन में चल रहे गाने का वॉल्यूम और बढ़ा दिया।
"खाना नहीं खाएंगे .....बस मोमोज खिला दो, समोसा खिला दो, कुरकुरे खिला दो। हम लोगों को तो दो टाइम रोटी और नाश्ते में पराठा मिलता था बस। यहां चाहे कुछ भी अच्छे से अच्छा बना दो खाएंगे ही नहीं। ना टाइम से खाना, ना टाइम से सोना। हाथ पैर तो हिलाएंगे ही नहीं। कहते हैं पढ़ रहे हैं फोन में। ठीक है, माना.... लेकिन फ्री टाइम में भी फोन में ही गेम, फोन में ही मूवी! ऐसा लगता है जैसे फोन से बाहर तो दुनिया है ही नहीं। वहीं इंस्टाग्राम व्हाट्सएप में दुनिया बसा रखी है। अरे जितना उस पर टाइम बिताते हो, इतना मां के साथ बैठकर बतिया लिया करो कभी। सिर दुखेगा तो दबाने मां ही आएगी.... इंस्टाग्राम व्हाट्सएप वाले दोस्त नहीं।"
बच्चों की नानी अरुणा बड़ी देर से सुन रहीं थीं, समझ भी रहीं थीं। किचन में जा कर दो कप चाय बना कर लाईं और इला को ड्राइंग रूम में बुलाया। "बैठो, बहुत हुआ। क्यों अपना बीपी बढ़ा रही हो?" 
ईला झुंझलाकर बोली, "मम्मी देख तो रही है आप। परेशान हो गई हूं मैं। क्या करेंगे यह बच्चे आगे चलकर? इनके भविष्य की बड़ी चिंता हो रही है मुझे।" 
"ईला शांत हो जा। इसी को कहते हैं जनरेशन गैप। उनकी बातें तेरी समझ में नहीं आएगी और उनको तेरी।" अरुणा उसकी बात काटते हुए बोलीं।
"क्या मां आप भी?" इला बोली, "आप तो जानती हैं कितनी प्रोग्रेसिव सोच की हूं मैं। आज के ज़माने के साथ चलने वाली आधुनिक नारी हूं, सब समझती हूं।"
"अच्छा! सब समझती तो इतना परेशान नहीं होती।" अरुणा मुस्कुराईं, "सब समझती तो अपना समय भूल नहीं जाती। हां, तुम्हारे टाइम पर ऐसी नहीं था.. लेकिन पापा के जाते ही सबसे पहले कूलर चला कर उसके सामने आसन जमा कर कौन बैठता था? फ्रिज का पानी पीकर बोतल भरना तुम भी भूलती थी बिटिया। सारा दिन टेप रिकॉर्डर पर गाने कौन सुनता था? शोर से बाबा डिस्टर्ब ना हों इसलिए तुमने ही तो जिद करके वॉकमैन खरीदवाया था, भूल गई? और पूरा दिन उसको कान में लगाकर घूमती थी।"
ईला वाकई अपने उसी टीन-एज के टाइम में जा चुकी थी.... वह भी हमेशा मां का हाथ बटाने में जी चुराती थी यह भी याद आया उसे। अरुणा बोलती जा रहीं थीं, "भूल गई? जब भी करेला, टिंडा या परवल की सब्जी बनती थी तुम लोगों के लिए टमाटर आलू बनता ही था। वरना खाना छूते तुम लोग?" ईला झेंप गई।
अरुणा ने कहा, "यह सच है कि इतना टाइम मोबाइल पर बिताना ठीक नहीं। लेकिन बच्चों के ऊपर प्रेशर भी तो देखो! तुम लोगों के 65% नंबर आने पर भी मिठाईयां बांटी हैं हमने। लेकिन इन पर प्रेशर 95% लाने का है.... क्या करें यह भी? जितना टाइम तुम्हारे पास होता था उतना ही तो है इनके पास भी..... लेकिन 95% लाने के लिए इन्हें मेहनत कितनी करनी पड़ेगी यह सोचा कभी? कभी इनकी मेहनत की इज्ज़त करके रात को जागती अवनी को कॉफी बना कर दी तुमने? बच्चों को कोसने के बजाय उनके चश्मे को पहन के कभी देखो और समझो। मैं यह नहीं कहती कि व्हाट्सएप इंस्टाग्राम चलाना सही है... लेकिन यह तुम्हें समझाना पड़ेगा कि वो लोग उसके अपने हैं या तुम... तुम उनको इतना प्यार दो कि उन्हें बाहर तलाशना न पड़े। इस उम्र में बच्चों को दोस्त प्यारे होते हैं... तो दोस्त बनने की कोशिश कर न बेटा। इस जेनरेशन गैप की दीवार को तोड़कर अपने बच्चे की तरफ प्यार का हाथ बढ़ा, उसका साथ दे।  बाकी भविष्य ऊपर वाले के हाथ में छोड़ दो ... अपने संस्कारों पर भरोसा रखो.... बच्चों का भविष्य उज्जवल होगा। कुछ समझी बिटिया या और लेक्चर दें?" हंसते हुए अरुणा ने कहा।
ईला की समझ में आ चुका था... अब बस उसे अमल करना था, जिसका वह प्रण ले चुकी थी । धीरे से बुदबुदाई - "इस जेनरेशन गैप की तो ऐसी की तैसी।"

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2022

जीवनसाथी

                  

I.A.S मनीषा मिश्रा.... यकीन नहीं हुआ मुझे। फिर से देखा ..... सोचा ..... क्या ये वो ही मनीषा है?

सिरफिरी, नकचढ़ी और भी जाने क्या क्या कहते थे लोग उसे.... नेम प्लेट पढ़ते ही जिस मनीषा मिश्रा की छवि आँखों के सामने उभरी, मन हो आया उससे मिलने का। हो न हो ये वो ही है....

बाहर गार्ड से कहा (नेम प्लेट की ओर इशारा करते हुए) “मुझे मैडम से मिलना है”।

उसने पूछा, “appointment है?”

मैंने झेंपते हुए कहा, “नहीं। लेकिन तुम कहना मीनल चौहान आई हैं”।

उसने ऊपर से नीचे तक देखा मुझे..... फिर अंदर गया तो अकेले वापस नहीं आया।

मुसकुराती हुई मनीषा उसके साथ आ रही थी। 

“रामेश्वर, दो चाय भिजवा देना। और हाँ.... एक चाय थोड़ी कडक बनवाना और दो चम्मच चीनी होनी चाहिए उसमें (मुस्कुराकर मेरी तरफ देखते हुए बोली) .... मीनल दी को मेरी तरह फीकी चाय पसंद नहीं”।

रामेश्वर, जो आश्चर्य से भरा हुआ कभी मनीषा कभी मुझे देख रहा था, अचानक घूम के चल दिया।

वो मेरा हाथ पकड़ कर लगभग खींचते हुए अपने ऑफिस में ले गई।

“मीनल दी! आखिर ढूंढ ही लिया न आपने मुझ सरफिरी को...” मुझसे चिपकते हुए बोली।

और मैं.....

बस देखे जा रही थी उसे। बाल बढ़ा लिए थे उसने। और ये क्या साड़ी! ऊपर से बिंदी भी... क्या ये वो ही बॉयकट बाल वाली, टॉमबॉय टाइप लड़की मनीषा है? अगर वो मुझे ऐसे न मिलती तो शायद ना पहचान पाती मैं।

“मीनल दी! कहाँ खोई हो? हैरान हो न मुझे देखकर? But yes..... अब ऐसी ही हूँ मैं”।

“कैसी हो मनीषा? शादी.... बच्चे... कुछ बताओ अपने बारे में...” सूझ ही नहीं रहा था क्या बोलूँ मैं.... सिर्फ इतना ही पूछ पाई।

“अरे दीदी.... अभी मत पूछो। लंबी कहानी है। मेरे साथ दो तीन रातें तो बितानी ही पड़ेंगी आपको। और हाँ.... फ़ायदा इसमें आपका भी है। मेरे जैसा करेक्टर मिलेगा नहीं आपको अपने नॉवेल के लिए....”।

मुझे फिर आश्चर्य हुआ, “तुझे कैसे पता मैं नॉवेल लिखती हूँ?”

“हा हा हा दीदी, इसी दुनिया में रहती हूँ, बस आपके सामने नहीं थी। आपके सारे नॉवेल, सारे कहानी संग्रह सब पढे हैं मैंने। ‘सिरफिरी लड़की’ कहानी आपने मुझ पर नहीं लिखी क्या.... बताओ तो?” ये लड़की मुझे हैरान पर हैरान किए जा रही थी।

“अच्छा दीदी, अपना एड्रैस लिखो इस पे (एक पेपर और पेन पकड़ाते हुए एक फोन आने पर हड़बड़ी में उसने कहा) कौन से होटल में हो? आपको वहीं से पिक कर लूँगी। अभी मुझे जाना होगा.....कुछ अर्जेंट है”।

“आपको कहीं ड्रॉप कर दूँ?”

“नहीं .... तुम निकलो... मुझे अभी किसी से मिलना है”। एड्रैस लिखकर कागज का वो टुकड़ा उसे पकड़ाते हुए मैं बोली।

“अरे रामेश्वर! सॉरी यार। तुम मीनल दी को चाय पिलाओ, मुझे निकलना है”। 

“मीनल दी! चाय पी के जाओ। हरिहर चाय बहुत अच्छी बनाता है। हॉस्टल के रमेश की याद आ जाएगी आपको...” और हँसते हुए निकल गई वो। 

सचमुच.... चाय पीते हुए रमेश महाजन की याद आ गई मुझे। हमारी मेस में ऐसी ही चाय बनती थी। रमेश महाजन की चाय के फ़ैन थे हम और उसके बरताव के भी। कभी कभी पैसे ना होने पर फ्री की चाय भी पिला देता था। छोटा सा लड़का लेकिन इतना समझदार था कि अगर हम लोग घंटों बैठ कर अपने दुख दर्द बाँट रहे होते, तो भीड़ होने पर भी हम लोगों को टेबल से उठने को नहीं कहता। कई लड़कियां जलती थीं हम लोगों से उसके इस बर्ताव के लिए। मनीषा ने हॉस्टल छोडते समय उसे एक ट्रान्जिस्टर गिफ्ट किया था क्योंकि उसे गाने सुनना बहुत पसंद था। 

सारा दिन मनीषा का चेहरा मेरी आँखों के सामने रहा। चेहरा.... नहीं चेहरे...एक टॉम बॉय मनीषा, और एक ये .... I.A.S. मनीषा मिश्रा... मनीषा को लड़कियों के साथ खेलते कम ही देखा था मैंने। शॉर्ट्स पहने, बॉय कट बालों में लड़कों के साथ बास्केटबाल खेलती मनीष को देखकर कोई नहीं कह सकता था कि वो लड़की है। हॉस्टल का कोई नियम मंजूर नहीं था उसे। या यूं कहें ... कि उसके अपने नियम थे.....बिना किसी नियम के जीना।

रूल्स तो वो अपने पिताजी के भी नहीं मानती थी। जिसकी वजह से कई बार डांट भी खाई और मार भी। हॉस्टल में कई बार उसकी चोटों पर दवा लगाई है मैंने। पढ़ने में अच्छी थी वो शुरू से। लेकिन ज़्यादा देर उसे पढ़ते देखा नहीं कभी मैंने। या यूं कहूँ कि हॉस्टल में वो पढ़ती ही नहीं थी। शायद क्लास में ही ध्यान दे के पढ़ती थी वो, तभी तो इतने अच्छे मार्क्स आते थे। ये भी एक कारण था कि उसके पिताजी ने उसकी पढ़ाई नहीं छुड़वाई थी। एक बार ये नौबत भी आई थी.... जब स्कूल के पास चार पाँच लड़कों को पीट कर घर पहुंची थी जो 9वीं क्लास की बच्चियों को छेड़ रहे थे। उसके पिताजी का कहना था कि उसे बीच में नहीं पड़ना चाहिए था। सारी दुनिया को सुधारने का ठेका उसी ने ले रखा है क्या? प्रिन्सिपल सर ने उसके पिताजी से अनुरोध करके उसका नाम कटने से बचा लिया था। इतनी मेधावी छात्रा का नाम वो कैसे कटने दे सकते थे?

अचानक दरवाजे की दस्तक मुझे वापस खींच लाई थी अतीत से। सामने आईएएस मनीषा मिश्रा खड़ी थी। 

“सॉरी दी, बड़ी मुश्किल से जान छुड़ा के आई हूँ....”

“लेकिन तुम तो शाम को आनेवाली थीं ना... फिर इतनी जल्दी?”

“सच कहूँ मीनल दी, बस चलता तो एक मिनट भी आपसे दूर न जाती। लेकिन सरस्वती के पति को सबक सिखाना ज़रूरी था...”

“सरस्वती .... कौन?” मैंने पूछा।

“सरस्वती मेरे साथ काम करती है और ये ही उसका अपराध है। एक औरत हो कर वो आवाज़ कैसे उठा सकती है? कैसे दूसरी औरतों की आवाज़ बन सकती है? उसके पति ने उसका हाथ खौलते तेल की कड़ाही में डाल दिया क्योंकि पूरियाँ फूल नहीं रहीं थीं उसकी..... उफ़्फ़..... बंद करवा के आई हूँ साले को”।

“तुम?.....ये सब?..... कबसे?” मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

“ यू नो मीनल दी.... सात साल खूब सहा मैंने भी..... आश्चर्य हो रहा है ना आपको? ..... लेकिन सच है ये। वो सक्षम.... कितना प्यार, कितनी केयर दिखाता था ना....याद है आपको? चार साल के प्यार के बाद कॉलेज खत्म करते ही शादी कर ली थी हम दोनों ने.... आप लंदन जा चुकी थीं तब...”

मुझे अच्छे से याद था वो किस्सा, आज भी मेरी आँखों के सामने..... मनीषा को कभी साइड सीट पर नहीं बैठने देता था सक्षम। कहता था कि कोई ना कोई बहाने से टच कर लेगा। मनीषा को शॉर्ट टॉप पहनने पर बहुत तंज़ करता था। उसके इस बर्ताव पर मैंने मनीषा से कहा भी कि ये ज़रूरत से ज़्यादा टोका टाकी करता है। पर उस समय इसकी आँखों पर चश्मा चढ़ा हुआ था प्यार का। एक बार तो लड़ भी ली मुझसे इसी बात पर। दीदी आपका कोई बॉयफ्रेंड नहीं है ना तो आप जलती हो मुझसे। वो कहते हैं ना प्यार में सब कुछ हरा हरा दिखता है। अब कौन और कैसे समझाता इस पगली को।

“जाने क्या हो जाता है प्रेमी को पति बनते ही.... कहाँ से पुरुषत्व जाग उठता है उसका...... छोड़ो.... मैं भी क्या बात ले कर बैठ गई। उफ़्फ़.... 6 बज गया। दीदी चलो आपको सैर कराती हूँ देहरादून की। देखो तो आप दिल्ली में रहकर माँ प्रकृति के कौन से रूप को मिस कर रही हो.....” वो मेरे ख़यालों से अंजान अपनी रौ में बोले चली जा रही थी।

चल दिये दोनों.... सखियाँ.....बहनें.... कॉलेज के दिनों में भी हम ऐसे ही निकल पड़तीं थीं सैर सपाटे पर। कुछ जादू तो था इस लड़की की बातों में। गार्ड भैया से उनकी बाइक की चाभी मांग लेना उसके बाएँ हाथ का काम था। जी हाँ .... बाइक चलाती थी वो..... लड़के क्या चलाते होंगे.... फर्राटेदार एक दम। मुझे तो बड़ा डर लगता था। उसको कसके पकड़ के बैठती थी मैं। वो बड़ी ज़ोर से हँसती..... दीदी क्या आप भी.... भीम नहीं हूँ मैं जो आप धृतराष्ट्र बनकर मेरी पसलियाँ तोड़ दो.... आराम से बैठो ना यार....chill.... ( मैं ख़यालों से बाहर ही नहीं आ पा रही थी.... इतनी सारी यादें जो थीं ..... खूबसूरत, बेहद प्यारी)

“कहाँ है अब सक्षम?” कुरेदा मैंने उसे।

“सक्षम?” गाड़ी चलाते हुए रास्ते पर से आँख हटा कर उसने मेरी तरफ देखा “होगा अपने क्लीनिक में.... डॉक्टर सक्षम....मेरा प्यार, फिर मेरा पति और अब..... कुछ भी नहीं”। गहरी सांस लेकर कहा उसने ....

“आपको याद है मीनल दी?” अतीत से आती हुई आवाज़ में कहा उसने “ शादी से पहले ही वो थोड़ा possessive था। कितना नाराज़ होता था वो जब सौरभ या राहुल से बात करती थी मैं। आपने...आपने समझाया भी था मुझे तब... उस possessiveness में उसका प्यार दिखता था मुझे। लेकिन इस possessiveness ने एक पिंजरे का रूप ले लिया फिर....प्यार का पिंजरा। मुझे समझ नहीं आता था कि मैं कैसे react करूँ....”

“फिर एक दिन.... मेरे कलीग अक्षत को लेकर उसने बहुत सुनाया मुझे.... यहाँ तक कि वेश्या तक कह दिया..... बस..... वो दिन आखिरी दिन था हमारे रिश्ते का....”

“उसी दिन ‘अम्मा’ हॉस्टल चली गई थी मैं। फिर .... उसकी तरफ मुड़ के नहीं देखा मैंने.... आया वो कई बार.... लेकिन उतार गया था दिल से। जो मेरी, मेरे आत्मसम्मान की इज्ज़त नहीं कर सकता वो कैसे मेरा जीवनसाथी हो सकता है?”

“मेरे जैसी और भी थीं अम्मा हॉस्टल में। बस... सोच लिया मैंने कि मुझे लड़ना है। अपने लिए तो अपने हौसले की वजह से लड़ ली लेकिन वो.... जो घुटती रहतीं हैं, अपने आत्मसम्मान को होम कर जलती रहतीं हैं....उनके लिए”।

“ज़रूरत थी हथियार की। मैंने ठान लिया था कि मुझे आइएएस बनना है। फिर से मेरा हौसला मेरा साथी बना। फ़र्स्ट अटैम्प्ट में ही pre और mains क्लियर किए मैंने। इंटरव्यू में तो वो लोग हतप्रभ रह गए थे मेरे जवाब सुन कर..... (हंसी वो...अतीत में ही) एक ने कहा – मैडम, इतना तेवर अच्छा नहीं। मुश्किल में पड़ सकतीं हैं आप। 

मैंने कहा, “उस मुश्किल से मुझे मेरा ये तेवर ही निकालेगा सर आप फिक्र ना करें”।

“आईएएस बनने के बाद भी मैंने नौकरी नहीं की। मेरा सपना कुछ और ही था.... संस्था को establish करने के लिए फ़ाइनेंस भी चाहिए था। मैंने अपने आईएएस बैच के दोस्तों से संपर्क किया....उनहोंने और उनके दोस्तों ने मेरी बहुत मदद की....”

“और जो हूँ आज......आपके सामने हूँ”।

गहरी सांस ले कर मेरी तरफ देख कर हंस दी वो....

उसकी हंसी में जो आत्मविश्वास था, वो ही था उसका सच्चा जीवनसाथी।

गुरु दक्षिणा

पिता - आज सिद्धेश्वर की खुशी का ठिकाना नहीं था। उसका बेटा, एक रिक्शे वाले का बेटा अफसर बनने जा रहा था। उसे याद आ गए वो दिन जब उसका अपना बेटा पैदल स्कूल जाता था और सिद्धेश्वर दूसरों के बच्चों को अपने रिक्शे में बिठा कर स्कूल छोड़ने जाता था। तपती दोपहर में अपने बच्चे के पैदल स्कूल से लौटने के बारे में जब सोचता, तो दूसरों के बच्चों को धूप से बचाने के लिए रिक्शे का हुड चढ़ा लेता।

उसे याद नहीं कब वो अपने बच्चे के लिए नई किताबें लाया होगा। पुरानी किताबों से, रद्दी में फेंकी हुई कॉपियों के बिना लिखे पन्ने जोड़-जोड़ का बनाई गई कॉपियों से पढ़ा था सुभाष।

आज के इंटरव्यू में पास होते ही वो बड़ा अफसर बन जाएगा। सलाम करेंगे लोग उसे..... सरकारी गाड़ी भी मिलेगी.... रमेश से कहेगा वो, कि अपना ठेला कहीं और खड़ा कर ले। उसके घर के सामने उसके बेटे की सरकारी गाड़ी (नीली बत्ती वाली) खड़ी होगी।

माँ –

 सुबह से ही गाँव भर के मंदिरों की घंटियाँ बजा आई थी मालती। सबसे अच्छी धोती पहनी थी आज उसने जिसमें सिर्फ दो पैबंद थे। आज के खाने में थी बेटे की पसंद की तरकारी और साथ में घी लगी रोटी। वो जानती थी सुभाष को घी लगी रोटी बहुत पसंद है। उसके हर जन्मदिन पर किसी न किसी मालकिन से घी मांग लाती वो, जिससे उसकी रोटी चुपड़ सके। आज घी थोड़ा ज़्यादा था तो आटा भून के हलवा बना दिया था उसने। बिना मुंह मीठा कराये थोड़े ही भेजेगी अपने होनहार सपूत को। आँखें करमजली न जाने क्यों बहे जा रही हैं इतने खुशी के मौके पर....

सुभाष – आ गया था वो खास दिन सुभाष के लिए जब वो अपनी माँ, अपने पिता के सपनों को साकार कर सकता था। कैसे भूल सकता था वो कि उसके पिता बुखार में तपते हुए भी रिक्शा चलाते थे। उसकी माँ घुटनों में दर्द से परेशान होते हुए भी लोगों के घरों में झाड़ू-पोंछा करती थी, बर्तन धोती थी।

आज वो उन लोगों के सामने तन कर खड़ा हो सकता था जिन लोगों ने उसके माँ-पिताजी को गरीबी के ताने दिये थे। ठान लिया था उसने कि अपने माँ पिता को कभी भी कोई काम नहीं करने देगा। माँ के घुटनों का इलाज करवाएगा। पिताजी के लिए गाड़ी खरीदेगा जिसमें पिता ड्राइविंग सीट पर नहीं, पीछे मालिक बनकर शान से बैठेंगे। नए कपड़े सिलवाएगा दोनों के लिए। उन दोस्तों के लिए भी शानदार गिफ्ट खरीदेगा जिन्होंने किसी न किसी तरह उसकी मदद की। 

यूं ही सपनों में डूबा हुआ सुभाष इंटरव्यू के लिए ऑफिस पहुंचा। सिर्फ दो लोगों का इंटरव्यू होना था। एक उसका और एक उसके गुरुजी के बेटे सिद्धांत का। सिद्धांत भी बड़ी मुश्किलों से पढ़ा था। गुरुजी की छोटी सी तनख़्वाह में बड़ी मुश्किल से उसकी पढ़ाई हो पाती थी। साथ ही सिद्धांत बहुत अच्छा दोस्त था उसका। उसके गुरुजी, श्यामाप्रसाद जी ने कभी दोनों में भेद नहीं किया। दोनों को स्कूल के बाद साथ बैठाकर पढ़ाते थे वो। वो भी बिना उससे पैसे लिए। बहुत अहसान मानता था सुभाष उनका। 

तभी सामने से गुरुजी को आते देख वो चरणस्पर्श करने लपका, गुरुजी ने उसे सीने से लगा कर कहा,”सुभाष मुझे कुछ बात करनी थी तुमसे। तुम जानते हो मैंने सिद्धांत को बड़ी मुश्किलों से पढ़ाया है। तुम भी मेरे बेटे जैसे हो। लेकिन अगर तुम इंटरव्यू में नहीं जाते हो ......” अपने पैरों में गिरते गुरुजी को थाम कर उसने उनके पैर छुए और सिद्धांत की तरफ बढ़ गया। उसको बधाई दे कर वापस, दरवाजे की तरफ मुड़ गया सुभाष। उसे खुद पर भरोसा था कि ऐसी कई नौकरियाँ उसको मिल सकती हैं लेकिन, गुरुदक्षिणा भी तो देनी थी उसे....