सहर
ये ख़ुशनुमा सहर
यूँ ही नहीं होती ख़ूबसूरत...
पहन कर आती है सुनहरी लिबास
नयी उम्मीदों का...
सतरंगी चूनर
हमारे सपनों की...
बड़ी सी बिंदिया
हमारे आत्म-विश्वास की...
बिखराती है उजास हमारी
राहों में
मार्ग-प्रशस्ति के लिए...
लगाती है टीका
पहली किरण से हमारे माथे पर...
करती है आश्वस्त कि 'बढ़ो'...
दूर, जो मंज़िल है...
सिर्फ़ तुम्हारे लिए है...
सिर्फ़ तुम्हारी है...
~श्यामली
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