गुरुवार, 10 फ़रवरी 2022

गुरु दक्षिणा

पिता - आज सिद्धेश्वर की खुशी का ठिकाना नहीं था। उसका बेटा, एक रिक्शे वाले का बेटा अफसर बनने जा रहा था। उसे याद आ गए वो दिन जब उसका अपना बेटा पैदल स्कूल जाता था और सिद्धेश्वर दूसरों के बच्चों को अपने रिक्शे में बिठा कर स्कूल छोड़ने जाता था। तपती दोपहर में अपने बच्चे के पैदल स्कूल से लौटने के बारे में जब सोचता, तो दूसरों के बच्चों को धूप से बचाने के लिए रिक्शे का हुड चढ़ा लेता।

उसे याद नहीं कब वो अपने बच्चे के लिए नई किताबें लाया होगा। पुरानी किताबों से, रद्दी में फेंकी हुई कॉपियों के बिना लिखे पन्ने जोड़-जोड़ का बनाई गई कॉपियों से पढ़ा था सुभाष।

आज के इंटरव्यू में पास होते ही वो बड़ा अफसर बन जाएगा। सलाम करेंगे लोग उसे..... सरकारी गाड़ी भी मिलेगी.... रमेश से कहेगा वो, कि अपना ठेला कहीं और खड़ा कर ले। उसके घर के सामने उसके बेटे की सरकारी गाड़ी (नीली बत्ती वाली) खड़ी होगी।

माँ –

 सुबह से ही गाँव भर के मंदिरों की घंटियाँ बजा आई थी मालती। सबसे अच्छी धोती पहनी थी आज उसने जिसमें सिर्फ दो पैबंद थे। आज के खाने में थी बेटे की पसंद की तरकारी और साथ में घी लगी रोटी। वो जानती थी सुभाष को घी लगी रोटी बहुत पसंद है। उसके हर जन्मदिन पर किसी न किसी मालकिन से घी मांग लाती वो, जिससे उसकी रोटी चुपड़ सके। आज घी थोड़ा ज़्यादा था तो आटा भून के हलवा बना दिया था उसने। बिना मुंह मीठा कराये थोड़े ही भेजेगी अपने होनहार सपूत को। आँखें करमजली न जाने क्यों बहे जा रही हैं इतने खुशी के मौके पर....

सुभाष – आ गया था वो खास दिन सुभाष के लिए जब वो अपनी माँ, अपने पिता के सपनों को साकार कर सकता था। कैसे भूल सकता था वो कि उसके पिता बुखार में तपते हुए भी रिक्शा चलाते थे। उसकी माँ घुटनों में दर्द से परेशान होते हुए भी लोगों के घरों में झाड़ू-पोंछा करती थी, बर्तन धोती थी।

आज वो उन लोगों के सामने तन कर खड़ा हो सकता था जिन लोगों ने उसके माँ-पिताजी को गरीबी के ताने दिये थे। ठान लिया था उसने कि अपने माँ पिता को कभी भी कोई काम नहीं करने देगा। माँ के घुटनों का इलाज करवाएगा। पिताजी के लिए गाड़ी खरीदेगा जिसमें पिता ड्राइविंग सीट पर नहीं, पीछे मालिक बनकर शान से बैठेंगे। नए कपड़े सिलवाएगा दोनों के लिए। उन दोस्तों के लिए भी शानदार गिफ्ट खरीदेगा जिन्होंने किसी न किसी तरह उसकी मदद की। 

यूं ही सपनों में डूबा हुआ सुभाष इंटरव्यू के लिए ऑफिस पहुंचा। सिर्फ दो लोगों का इंटरव्यू होना था। एक उसका और एक उसके गुरुजी के बेटे सिद्धांत का। सिद्धांत भी बड़ी मुश्किलों से पढ़ा था। गुरुजी की छोटी सी तनख़्वाह में बड़ी मुश्किल से उसकी पढ़ाई हो पाती थी। साथ ही सिद्धांत बहुत अच्छा दोस्त था उसका। उसके गुरुजी, श्यामाप्रसाद जी ने कभी दोनों में भेद नहीं किया। दोनों को स्कूल के बाद साथ बैठाकर पढ़ाते थे वो। वो भी बिना उससे पैसे लिए। बहुत अहसान मानता था सुभाष उनका। 

तभी सामने से गुरुजी को आते देख वो चरणस्पर्श करने लपका, गुरुजी ने उसे सीने से लगा कर कहा,”सुभाष मुझे कुछ बात करनी थी तुमसे। तुम जानते हो मैंने सिद्धांत को बड़ी मुश्किलों से पढ़ाया है। तुम भी मेरे बेटे जैसे हो। लेकिन अगर तुम इंटरव्यू में नहीं जाते हो ......” अपने पैरों में गिरते गुरुजी को थाम कर उसने उनके पैर छुए और सिद्धांत की तरफ बढ़ गया। उसको बधाई दे कर वापस, दरवाजे की तरफ मुड़ गया सुभाष। उसे खुद पर भरोसा था कि ऐसी कई नौकरियाँ उसको मिल सकती हैं लेकिन, गुरुदक्षिणा भी तो देनी थी उसे....

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें