सोमवार, 9 सितंबर 2013

" मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना "

मित्रों,
आजकल रोज़ अखबार में, न्यूज़ चैनल्स में दंगे, हिंसा, लूट-पाट, बलात्कार आदि समाचार बेहद आम हो गए हैं। कभी सोचा आपने कि क्या ये सब एकदम से शुरू हो गया है? क्या पहले ये सारे अपराध नहीं होते थे? अचानक से हमारे अन्दर का पिशाच जाग उठा है?
नहीं, ये पूर्ण सत्य नहीं है मित्रों। ये सब कुछ पहले भी होता था। आदमी के अन्दर हमेशा से एक हैवान रहा है।  बस फर्क ये है कि पहले ऐसी घटनाएं कम होती थीं या यूँ कहिये कि मीडिया इतना सक्रिय नहीं था जो इन समाचारों को हमारे संज्ञान में ला सके। अब समाचार तंत्र इतना ज्यादा सक्रिय हो गया है कि जिसके  फायदे कम और नुक्सान ज्यादा हैं।  पहले कोई छुट-पुट घटना हुई, उसे वहीँ  control  कर लिया जाता था।  मीडिया में खबर जाती ही नहीं थी कि जिससे उस घटना पर कहीं बाहर कोई प्रतिक्रिया हो सके। लेकिन अब तो घटना की जानकारी पुलिस से पहले मीडिया तक पहुँच जाती है और मीडिया वाले उसे आकर्षक ब्रेकिंग न्यूज़ बनाकर देश-विदेश में प्रसारित कर देते हैं बिना परिणाम पर गौर किये।
आज भी हम देख रहे हैं मुज़फ्फरपुर वाली वारदात तमाम चैनल्स की हॉट न्यूज़ बनी हुई है।  बिना ये सोचे सब कुछ प्रसारित किया जा रहा है कि इसका असर पूरे देश पर पड़ेगा और इसका खामियाजा आम जनता को ही भुगतना पड़ेगा।
मेरी उन तमाम भाई-बंधुओं से गुजारिश है कि अपने विवेक के अनुसार इन न्यूज़ को देखें।  अपराध की कोई जाति या धर्म नहीं होता, अपराधी को अपराधी ही समझें, हिन्दू या मुसलमान न समझें क्योंकि
" मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना "
तो मित्रों! अफवाहों पर बिलकुल ध्यान न दें।  आपके पास अपना विवेक, अपनी समझ है; उसके अनुसार हर समाचार को देखें, समझें।
शुभ-रात्रि। 

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