शनिवार, 8 मार्च 2014

मैं कहाँ हूँ?

मैं कहाँ हूँ?

मेरा अस्तित्व तुमसे है,
मुझमें
मैं कहाँ हूँ?
ये तो तुम हो, मैं तो हूँ प्रतिबिंब जैसे हो तुम्हारा,
तुम्हीं से है मेरी पहचान,
लेकिन
मैं कहाँ हूँ??
तुम्हारे इर्द-गिर्द बस्ती है जैसे मेरी दुनिया,
मेरी दुनिया में लेकिन
मैं कहाँ हूँ?
तुम्हारे आवरण में छिप गयी हूँ
तुम्हारे दायरों में बांध गयी हूँ  ……
चाहती हूँ अपना एक आकाश,
अपनी दुनिया,
अपनी पहचान,
अपना अस्तित्व  ……
नहीं  .... तुमसे नहीं चाहती
नहीं  .......... तुमसे नहीं मांगूंगी
खुद बनाउंगी अपनी एक पहचान,
खुद सजाऊँगी अपनी एक दुनिया,
खुद उगाऊंगी अपने पंख  …… उड़ूंगी आसमान में,
खुद गढूंगी अपना एक अस्तित्व 
निकल कर दायरों से इठलाऊँगी
दिखाऊंगी
कि देखो
मैं यहाँ हूँ
देखो मैं यहाँ हूँ।
- श्यामली

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