गुरुवार, 12 जनवरी 2023

बाल - मन

  भाग - १


जन्म लेते ही जब बच्चा बोल भी नहीं पाता, सिर्फ उसके हाव भाव से उसे, उसकी जरूरतों को समझना नए बने माता - पिता के लिए बेहद मुश्किल है और एक बड़ी उपलब्धि के समान है। मैंने देखा भी है एवं महसूस भी किया है कि जब बच्चा आपकी सिखाई हुई किसी चीज को करता है, उस बच्चे से अधिक उसके माता पिता खुश होते हैं, उत्साहित हो जाते हैं जैसे कोई बड़ी उपलब्धि मिल गई हो। उदाहरण स्वरूप जब बच्चा पहली बार मां या पापा कहता है, माता पिता की खुशी देखते ही बनती है। वो ही एक समय होता है जब हम माता पिता अपनी खुशी के आगे ये देखना भूल जाते हैं कि हमें खुश देख कर बच्चा भी बहुत खुश होता है। हम उसमें अपनी उपलब्धि तो देखते हैं लेकिन ये समझना भूल जाते हैं कि उस बच्चे की ये कितनी बड़ी उपलब्धि है। यहीं से, इसी समय से ज़रूरी हो जाता है चाइल्ड साइकोलॉजी को समझना।

अधिकतर ये होता है कि छोटा बच्चा जो बोल नहीं पाता, जब रोता है तो हम ये समझते हैं कि उसे भूख लगी है या कहीं दर्द हो रहा है। लेकिन क्या हम ये सोच पाते हैं कि हो सकता है वो आपका attention, आपका ध्यान अपनी तरफ चाहता हो। हो सकता है वो चाहता हो कि आप अपना समय उसे दें। ये भी समझने की आवश्यकता है, ऐसे भी सोचना चाहिए हमें। 

हालांकि आज के समय में जब माता पिता दोनों वर्किंग हैं, थोड़ा मुश्किल जरूर होता है कि अधिक से अधिक समय अपने बच्चे को दें लेकिन ये बात वो छोटा सा बच्चा नहीं समझ सकता उसे तो अपने माता पिता की ज़रूरत है ही। लेकिन हम क्या करते हैं? उसे आया या दादा दादी या नाना नानी यहां तक कि क्रेच में छोड़ देते हैं। ऐसा करके हम बच्चे को समझौता करना सिखाते हैं जिससे होता क्या है? बच्चा प्यार पहचानता है, जिससे अधिक मिलेगा उसके नज़दीक रहना चाहेगा, आपसे अधिक मिलेगा तो आपके पास वरना दादा दादी, नाना नानी या आया के पास रहना पसंद करेगा और भावनात्मक रूप से शायद आपसे थोड़ा सा दूर हो जाएगा, (क्रेच से तो शायद ही कोई बच्चा भावनात्मक रूप से जुड़ता हो)। धीरे धीरे उसके व्यवहार में कुछ कुछ बदलाव होने लगता है। अच्छा है तो ठीक लेकिन ये व्यवहार अच्छा नहीं है तो क्या हम इस बदलाव को  महसूस करते हैं? शायद नहीं, कभी कभी करते भी हैं तो नज़र अंदाज़ कर देते हैं और कभी कभी समझते भी हैं लेकिन ये समझ नहीं पाते कि क्या करें। कभी कभी या अक्सर ये होता है कि हमारे बुज़ुर्ग या आया बच्चे से लाड़ प्यार में या बच्चे के रोने के डर से उसकी हर बात मान लेते हैं। अब बच्चा इतना छोटा होता है कि उसे पता नहीं होता की क्या सही है और क्या गलत, उसे तो हर वो चीज़ करनी है को उसे पसंद है और वो माता पिता से दूर होने की सहानुभूति का फायदा उठा कर अपने संरक्षक से किसी भी तरह से अपनी बात मनवा लेता है। यहीं से शुरुआत होती है बदलाव की जिसकी वजह से बच्चा जिद्दी हो जाता है और अगर कभी उसकी बात नहीं मानी जाती तो वो चिड़चिड़ा हो जाता है। आदतें धीरे धीरे पड़ती हैं, शुरुआत में ही अगर उसके व्यवहार में होते बदलाव को समझ कर अगर हम सुधार के कुछ उपाय नहीं करते तो फिर ये उसकी आदत में आ जाता है, जिसे बदलना बहुत ही मुश्किल हो जाता है। 

क्या करें - पहले तो बदलाव को पहचानें लेकिन किसी और बच्चे से तुलना मत करें। याद रखें कि हर इंसान की प्रकृति अलग होती है, तो दूसरों के साथ तुलना करके, उसकी तरह व्यवहार करने की शिक्षा देना इस समस्या का समाधान नहीं है। बच्चे से अधिक से अधिक बात करें, उससे समझें की उसका ऐसा व्यवहार क्यों है, उसे सही गलत उदाहरणों के माध्यम से समझाएं, महापुरुषों के बचपन की कहानियां सुनाएं, अपने बड़ों से सहयोग अवश्य लें। इतने सब के बाद भी अपने बच्चे को आपसे बेहतर कोई नहीं समझ सकता, तो उसकी हर समस्या को शांति से सुलझाएं। ज़रूरत पड़ने पर मनोवैज्ञानिक से संपर्क अवश्य करें। 

शुभम् भवतु।


12.01.2023

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