भाग- २
अक्सर हमने लोगों को ये कहते सुना है कि बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं, हम जैसा ढालेंगे, वो ढल जाएंगे। और हम उस कुशल कुम्हार की भांति उसे बेहतरीन बनाने में लग जाते हैं… मगर क्या ये सही है?
जैसे कुम्हार मिट्टी को अपनी कल्पना अपनी कुशलता अपनी ज़हीनियत के हिसाब से गढ़ता है, हम अपने बच्चे को अपनी कल्पनाओं, अपनी कुशलताओं, के हिसाब से गढ़ने लगते हैं। हम अक्सर खुद जिन सपनों को पूरा नहीं कर पाते, वो सपने अपने बच्चों के माध्यम से पूरा करने की कल्पनाओं में खोए उसे उसी राह पर चलाने की कोशिश करते हैं। जाने अंजाने ही सही, हम उसे वो ही रास्ता दिखाने की कोशिश करते हैं जो हमें सही लगता है।
हम अक्सर ये भूल जाते हैं कि हमारी, हमारी सोच, हमारी कुशलताओं की भी सीमा है…. ये आवश्यक नहीं कि जो हमें सही लग रहा हो वो ही सही हो हमारी संतान के लिए। उसकी अपनी सोच, उसकी अपनी कुशलताएं, उसकी अपनी अलग दृष्टि या विचारशीलता हो सकती है, उसकी अपनी सीमाएं हो सकती हैं ये हमारे मस्तिष्क में ही नहीं आता।
' बच्चा कच्ची मिट्टी नहीं है, इंसान है … वो भी भरे पूरे दिमाग के साथ' ये याद रखना अति आवश्यक है। उदाहरण स्वरूप अक्सर हम बादलों में कुछ आकार देखते हैं … सबको अलग अलग आकार दिखते हैं अपनी कल्पना के अनुसार। लेकिन जैसे ही कोई एक किसी विशेष आकार का नाम ले लेता है, बाकी लोग भी अपनी कल्पना को उसी की तरफ एकीकृत करने की कोशिश करने लगते हैं, अंत में सबको वो ही आकार दिखने लगता है। यहां पर बाकी सबकी कल्पनाओं को उस एक की कल्पना ने धूमिल कर दिया। असल में ऐसा ही होता है। हम अपनी सोच को एक बड़े, अभिभावक, अधिक अनुभवी की तरह बच्चों की तरफ प्रेक्षित करते हैं एवं बच्चे अनुयायी की तरह उसी को सही मानने लगते हैं। हमारे घरों में चली आ रही पुरातन प्रथाएं (यहां सही गलत की बात नहीं हो रही) इसी का उदाहरण हैं। कुछ बच्चे जो बचपन में तार्किक होते हैं, या जिनके अभिभावक उन बच्चों की सोच को भी महत्व देते हैं, आगे जा कर तार्किकता के आधार पर सही प्रथाओं को मानते हैं एवं गलत प्रथाओं को दरकिनार कर देते हैं।
हम माता पिता दरअसल चाहते क्या हैं?
हर अच्छा अभिभावक चाहता है कि उसकी संतान दुनिया में सफलता प्राप्त करे, अच्छी नौकरी हो या बहुत सफल व्यवसाय हो, खूब धन दौलत हो, ऐश -ओ -आराम का जीवन हो। हम कुछ भी सामान्य नहीं चाहते अपनी संतान के लिए, बेहतरीन चाहते हैं। और इस चाह के चलते किसी कठिनतम लक्ष्य को उसकी कल्पनाओं में बसाने लगते हैं (डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस, पीसीएस वगैरह वगैरह)। हम ये मानना ही नहीं चाहते कि हमारा बच्चा साधारण भी हो सकता है। हम ये मान ही नहीं पाते कि जिस बच्चे को हम इंजीनियर बनाने की कोशिशों में लगे हैं, उससे अधिक से अधिक अंकों को प्राप्त करने के लिए जी तोड़ मेहनत करवा रहे हैं, हो सकता है उसके अंदर कोई कलाकार छुपा हो, कोई लेखक छुपा हो। पढ़ाई में वो मन लगाने की पूरी कोशिश करता हो निस्संदेह, लेकिन उसकी अपनी सीमाएं हैं, क्षमताएं हैं। हम ये भूल जाते हैं कि हम (अधिकतर अभिभावक) खुद भी औसत ही रहे हैं और अपनी संतान को घोड़े की तरह हांक रहे हैं अंकों की रेस जीतने के लिए। नतीजतन हो सकता है 5% बच्चे उस लक्ष्य को पाने में सफल हो भी जाएं तो ये गारंटी नहीं है कि वो उसी लक्ष्य के साथ ही आगे बढ़ें। हमारे समक्ष ऐसे कई डॉक्टरों, इंजीनियरों के उदाहरण हैं जो गायन, नृत्य, अभिनय, चित्रकारी वगैरह में सफल हुए हैं, सफल नहीं भी हुए तो भी खुश हैं अपने मन माफिक कैरियर में।
लेकिन उनका क्या जो अपनी उस लक्ष्य (जिसको पाने का अथक प्रयास किया) को पाने की अक्षमता (कारण कोई भी हो) की वजह से न वो लक्ष्य पा पाते हैं, न ही अपनी दूसरी योग्यताओं (जिनको संवारने के लिए कुछ नहीं किया) के साथ आगे बढ़ पाते हैं। बड़े सारे ऐसे बच्चे परिस्थितियों से समझौता करके साधारण कैरियर अपना लेते हैं और अपने बच्चों द्वारा अपने सपने पूरे किए जाने की आशा में जीवन बिताने लगते हैं।
लेकिन वो बच्चे जो अपनी असफलताओं से समझौता नहीं कर पाते, अक्सर कुंठित हो जाते हैं। अपने साधारण कैरियर के साथ समझौते की कोशिशों में अक्सर व्यसनों में अपने आपको उलझा लेते हैं या समाज से कटे कटे से रहने लगते हैं और किसी तरह से अपना जीवन व्यतीत करते हैं।
क्या करें?
हमें पहले तो ये समझना होगा कि बच्चा एक इंसान है जिसकी अपनी सोच, अपनी क्षमताएं, अपना एक बड़ा सा कैनवास है। हमें करना ये है कि उसके उस खाली कैनवास में उसे ही रंग भरने देना है, वो भी उसकी अपनी पसंद के रंग। हमें उसकी क्षमताएं समझनी हैं एवं उसे खुद ही बढ़ने देना है। एक छोटे बच्चे को जब पानी में तैरना सिखाते हैं तो उसे पानी में छोड़ दिया जाता है जिससे वो तैरना खुद ब खुद सीख लेता है। बस करना ये है कि उसे डूबने नहीं देना है। उसे उसके हिसाब से बड़े होने देना है, उसका साथ देकर, उसका ड्राइवर बन कर, उसके अपने चुने रास्ते पर। हां, उस रास्ते की अच्छाइयां, बुराइयां जरूर बताएं जिससे वो आगे आने वाले संघर्षों के लिए तैयार रहे। उसके साथ चलें लेकिन सहारा बनकर नहीं क्योंकि जिन्हें सहारे की आदत हो जाती है वे अपने दम पर कुछ नहीं कर पाते। उसमें अपना विश्वास जताएं, उसे ये विश्वास दिलाएं कि यदि इरादे नेक हों और कोशिशें ईमानदार हों तो कोई भी मंज़िल हासिल की जा सकती है और वो ये हर हाल में कर सकता है। यकीन जानिए यदि हम अपने बच्चे के साथ मालिक की तरह नहीं वरन एक सह जीवी की तरह बर्ताव करेंगे तो वो कुछ और बने न बने एक सफल इंसान अवश्य बनेगा, जो सही अर्थों में खुश होगा और ये ही उसकी और हमारी कामयाबी होगी।
शुभम् भवतु।
२१-०१-२०२३
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