दशहरा हम हिंदुओं का बहुत ही बड़ा पर्व है। इस दिन बुराई रूपी रावण का अच्छाई रूपी श्रीराम द्वारा वध किया जाता है। हम सभी इस दृश्य को देखने अवश्य जाते हैं एवं रावण वध की खुशियां मनाते हैं।
क्या हमने कभी सोचा कि आज इतने वर्षों बाद भी हम रावण दहन क्यों करते हैं? रावण तो श्री राम के हाथों त्रेता युग में ही मार दिया गया था, फिर आज भी क्यों?
दरअसल हम इंसान स्वयं में ही राम एवं रावण को समाहित किए हुए हैं। न हम पूरी तरह से राम हैं और न पूरी तरह से रावण। रावण होने का अर्थ है अपने अंदर कई दुर्गुणों का होना, जैसे गुस्सा, अहंकार आदि। तो अपने इन दुर्गुणों को धीरे धीरे अपने अंदर के राम द्वारा खात्मा कराकर ही हम बेहतर इंसान बन सकते हैं। अब दुर्गुण इतने हैं कि कोई एक चुटकी बजाने से तो खत्म होने से रहे। खुद को बेहतर बनाते रहना एक सतत प्रक्रिया है। इसी प्रक्रिया के तहत हमें अपने अंदर के रावण पर विजय प्राप्त करनी है।
हर विजय दशमी पर यदि हम अपने अंदर के एक दुर्गुण को भी खत्म करने का प्रण लें, तो हम इंसानियत में थोड़े से राम के निकट हो जाते हैं। बस यही कारण है कि वर्ष दर वर्ष हम अपने अंदर के दुर्गुणों को खत्म करते रहें और बेहतर इंसान बनते रहें इसलिए दशहरा मनाना चाहिए।
तो आज जब रावण का दहन देखने जाइए तो अपने अंदर के थोड़े से रावण की भी आहुति देते आइए।
शुभम् भवतु।
- श्यामली
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