ये ज़िंदगी
कभी चलती हुई
कभी बंद पड़ी घड़ी...
ये ज़िंदगी
कभी सुनहरी सुबह
कभी सपनीली शाम...
ये ज़िंदगी
सरकती रेत
मुठ्ठियों से...
ये ज़िंदगी
जो उगती है
तो ढलने के लिए ही...
ये ज़िंदगी
जो खिलती है
बिखरने के लिए ही...
ये ज़िंदगी
वो खिलौना
जिसे है टूटना एक दिन...
ये ज़िंदगी
कठपुतली
रब के हाथों की...
कोई कह दो ख़ुदा से-
न खेले इस तरह हमसे,
हमारी ज़िंदगी से
~श्यामली
कभी चलती हुई
कभी बंद पड़ी घड़ी...
ये ज़िंदगी
कभी सुनहरी सुबह
कभी सपनीली शाम...
ये ज़िंदगी
सरकती रेत
मुठ्ठियों से...
ये ज़िंदगी
जो उगती है
तो ढलने के लिए ही...
ये ज़िंदगी
जो खिलती है
बिखरने के लिए ही...
ये ज़िंदगी
वो खिलौना
जिसे है टूटना एक दिन...
ये ज़िंदगी
कठपुतली
रब के हाथों की...
कोई कह दो ख़ुदा से-
न खेले इस तरह हमसे,
हमारी ज़िंदगी से
~श्यामली
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