रविवार, 25 अगस्त 2013

आस्था बनाम अंधविश्वास

मित्रों,
पहले बता दूं  कि ये पोस्ट किसी के समर्थन या विरोध के लिए नहीं है। ये फिलहाल सिर्फ और सिर्फ आसाराम बापू के लिए लिखी गयी है लेकिन ऐसे और भी हैं। 
 इसे मैंने इसलिए लिखा है क्योंकि मुझे लगता है कि आस्था की आड़ में हमें छला जा रहा है और इसके लिए किसी और से ज्यादा हम ख़ुद दोषी हैं। हम लोगों की मानसिकता ऐसी हो गयी है कि जो कोई भी धर्म की बात करता है, हम आँख बंद करके उसके पीछे चल देते हैं बिना किसी तार्किकता के।  ये कौन लोग हैं जिनकी हर बात हमारे लिए पत्थर की लकीर होती है, जो कुछ भी करते हैं हम बिना उसकी प्रामाणिकता पर विचार किये उसे मान लेते हैं? मैं हर धर्मगुरु की बात नहीं करती लेकिन अधिकाँश हमारे भोलेपन का फायदा उठाते हैं।

मित्रों, मेरा मानना है कि अगर हमें आस्था ही रखनी है तो धर्मगुरु क्यों? वो  परमात्मा क्यों नहीं जिसके ये लोग एजेंट बने फिरते हैं? (क्षमा करें अगर किसी की भावना को ठेस पहुंची हो तो) अगर ज्ञान ही अर्जित करना है तो हमारी धार्मिक पुस्तकें क्या कम हैं जिन्हें सामने रखकर ये उनका अपमान करते हैं।

मित्रों, सोचें ज़रूर और अगर मेरी बात सही लगे तो कृपया खुद को और आपसे जुड़े उन तमाम लोगों को अंध-आस्था के गर्त में गिरने से बचाएँ जिनकी आपको परवाह है।

तो मित्रों, सतर्क रहें, आस्था ज़रूर रखें लेकिन अंधविश्वास से बचें।
शुभकामनाएं, शुभ-रात्रि। 

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