शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

चिंता-चिंतन

मित्रों,
आज मन बड़ा व्यथित है कुछ घटनाओं को सुन-पढ़ कर। सोचती हूँ क्या मानसिकता  होती होगी उन लोगों की जो महिलाओं को  सिर्फ़ उपभोग की वस्तु समझते हैं, उनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं, उन्हें तकलीफ पहुंचाते हैं और इस में अपना सुख तलाशते हैं, अपने अहं की तुष्टि करते हैं। कहाँ से आती है ये सोच या सिर्फ़ ये उनका inferiority complex है?
वैसे इसको समझने के लिए हमें अपने अन्दर झांकना होगा।  क्या हम अपने बच्चों को ऐसे संस्कार दे रहे हैं जिसमें दूसरों की इज्ज़त करना, उन्हें सम्मान देना सिखाया जाता है? जैसे हमारे बुज़ुर्ग हमें सिखाते थे कि कैसे हमारे घरों में काम करने वालों को भी इज्ज़त दे कर पुकारा जाता था - माली काका, महरी चाची, आदि। क्या हम उन्हें ऐसे स्कूल में पढ़ा रहे हैं जहाँ मानवीय मूल्यों को सिखाया जाता है?
इस सोच को backward या पुरातनपंथी सोच  मत समझें मित्रों। ये ही हमारी संतानों को  इंसान बनाएगी। अभी चेत जाइये नहीं तो ऐसी घटनाओं के लिए कहीं न कहीं हम ही ज़िम्मेदार होंगे।
शुभ-रात्रि

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