शनिवार, 24 अगस्त 2013

तलाश - मुझ में मेरी

मित्रों,
आज सुबह से थोड़े से समय की तलाश में थी कि कुछ लिख सकूं, अब जा कर समय मिला है।  कितने व्यस्त होते हैं  न हम पूरे दिन अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने में! सुबह बड़ी बेटी को स्कूल भेजने के लिए उसे तैयार करना, टिफिन बनाना, उसके स्कूल जाने के बाद साफ़-सफ़ाई करना, नाश्ता बनाना, छोटी बेटी के सो कर उठने के बाद उसके आगे-पीछे भागना, खाना बनाना और भी न जाने क्या-क्या कि अगर सबका ज़िक्र करूँ तो पूरा पेज़ ही भर जाएगा। आपको नहीं लगता की परिवार की ज़रूरतों को पूरा करते-करते हम अपनी ज़रूरतों को भूल बैठे हैं? आपको याद है आखरी painting आपने कब बनायी थी?  या आखरी कविता/कहानी आपने कब लिखी थी? या आखरी बार अपने पसंदीदा लेखक की पुस्तक कब पढ़ी थी? याद नहीं आएगा आपको, क्योंकि  ये   सब बातें आपको अब गुज़रे ज़माने की लग रही हैं। अगर ऐसा है तो अभी चेत जाइये क्योंकि अनजाने में हमने अपने आपको कहीं खो दिया है। अब समय आ गया है अपने आप को तलाशने का।
मित्रों, आइये समय निकालें और ख़ुद से रूबरू  हों। यकीनन अपने उन भूले हुए शौक़ को पूरा करते हुए आप पहली बार अपने आप को इतना खुश पाएंगी। इसका अर्थ ये नहीं कि हम अपनी जिम्मेदारियों को पूरा न करें, बल्कि उन सबके साथ ताल-मेल बिठा कर अपने शौक़ पूरे करें।
शुरुआत करें सबके साथ-साथ अपने लिए भी जीने की।
शुभकामनाएँ।  

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