मित्रों,
कभी-कभी ऐसा होता है कि हमारा जीवन एक ही ढर्रे पर चलता जाता है और हम लगभग संतुष्टि का भाव लिए उसी ढर्रे घिसटते रहते हैं। ये एक बेहद खतरनाक अवस्था होती है मित्रों, जिसमें हमारी साँसें तो चल रही होती हैं लेकिन हमारा मस्तिष्क सुप्तावस्था जाता है। तो इससे पहले कि सुप्तावस्था से हम मृतावस्था पहुँच जाएँ, उठिए और अपने दिमाग पर चढ़ी गर्द झाड़िए। कितना कुछ हो रहा है हमारे आस-पास, हमारे समाज में, हमारे अपने देश में मानवता खिलाफ़ और हम अपने आप से ही नहीं उबर पा रहे!
मित्रों, अपने लिए, अपने बच्चों, अपने परिवार के लिए तो जानवर भी जीते हैं, उनकी सुविधा-असुविधा का ख़याल रखते हैं। अब समय है अपने समाज, अपने देश के प्रति अपने कर्त्तव्यों को पूरा करने का। मानती हूँ कि इसी कारण हमारे लोकतंत्र में नेताओं को चुना जाता है, ये काम उन्हें सौंपा जाता है; लेकिन उसे कार्य सौंपने के बाद हमें उस तरफ से अपनी आँखें तो नहीं बंद कर लेनी चाहिए न। अगर वो ठीक से अपना कार्य नहीं कर रहा है तो हमें ही सिखाना होगा न उसे ?
मित्रों, समय है अपने घर की गन्दगी खुद साफ़ करने का। आखिर घर(देश) हमारा है तो ज़िम्मेदारी हमारी भी तो बनती है !! तो मित्रों, शुरू हो जाइये, अपना सही माध्यम चुनिए जिसमें आप सहज महसूस करें, और जुट जाइये सफाई अभियान में। मैं ये नहीं कहती कि आप के अकेले के बस की बात है ये, लेकिन किसी को तो शुरुआत करनी पड़ेगी न। तो हम क्यों नहीं? क्यों हम किसी और से उम्मीद करें ? और मित्रों यकीनन शुरुआत में भले आप अकेले हों लेकिन ज्यों-ज्यों आप कदम बढ़ाएंगे कारवाँ खुद ब खुद बढ़ता जाएगा।
मैं आपके साथ हूँ।
शुभकामनाएँ
कभी-कभी ऐसा होता है कि हमारा जीवन एक ही ढर्रे पर चलता जाता है और हम लगभग संतुष्टि का भाव लिए उसी ढर्रे घिसटते रहते हैं। ये एक बेहद खतरनाक अवस्था होती है मित्रों, जिसमें हमारी साँसें तो चल रही होती हैं लेकिन हमारा मस्तिष्क सुप्तावस्था जाता है। तो इससे पहले कि सुप्तावस्था से हम मृतावस्था पहुँच जाएँ, उठिए और अपने दिमाग पर चढ़ी गर्द झाड़िए। कितना कुछ हो रहा है हमारे आस-पास, हमारे समाज में, हमारे अपने देश में मानवता खिलाफ़ और हम अपने आप से ही नहीं उबर पा रहे!
मित्रों, अपने लिए, अपने बच्चों, अपने परिवार के लिए तो जानवर भी जीते हैं, उनकी सुविधा-असुविधा का ख़याल रखते हैं। अब समय है अपने समाज, अपने देश के प्रति अपने कर्त्तव्यों को पूरा करने का। मानती हूँ कि इसी कारण हमारे लोकतंत्र में नेताओं को चुना जाता है, ये काम उन्हें सौंपा जाता है; लेकिन उसे कार्य सौंपने के बाद हमें उस तरफ से अपनी आँखें तो नहीं बंद कर लेनी चाहिए न। अगर वो ठीक से अपना कार्य नहीं कर रहा है तो हमें ही सिखाना होगा न उसे ?
मित्रों, समय है अपने घर की गन्दगी खुद साफ़ करने का। आखिर घर(देश) हमारा है तो ज़िम्मेदारी हमारी भी तो बनती है !! तो मित्रों, शुरू हो जाइये, अपना सही माध्यम चुनिए जिसमें आप सहज महसूस करें, और जुट जाइये सफाई अभियान में। मैं ये नहीं कहती कि आप के अकेले के बस की बात है ये, लेकिन किसी को तो शुरुआत करनी पड़ेगी न। तो हम क्यों नहीं? क्यों हम किसी और से उम्मीद करें ? और मित्रों यकीनन शुरुआत में भले आप अकेले हों लेकिन ज्यों-ज्यों आप कदम बढ़ाएंगे कारवाँ खुद ब खुद बढ़ता जाएगा।
मैं आपके साथ हूँ।
शुभकामनाएँ
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